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इंदौर नगर निगम के सहायक राजस्व अधिकारी के ठिकानों पर लोकायुक्त का छापा

31 साल की सेवा में करीब 80 लाख की आय, संपत्ति 2.53 करोड़; आय से 216 प्रतिशत अधिक संपत्ति मिलने का दावा



इंदौर। नगर निगम के सहायक राजस्व अधिकारी जितेंद्र पांडेय के ठिकानों पर लोकायुक्त पुलिस ने शुक्रवार को छापामार कार्रवाई की। कार्रवाई में उनकी घोषित एवं ज्ञात आय की तुलना में करीब 216 प्रतिशत अधिक संपत्ति सामने आने की बात कही गई है। लोकायुक्त की जांच में अधिकारी की करीब 31 साल की सेवा अवधि में लगभग 80 लाख रुपये की आय का आकलन किया गया, जबकि उनकी कुल संपत्ति करीब 2.53 करोड़ रुपये बताई गई है।


लोकायुक्त की कार्रवाई आय से अधिक संपत्ति के मामले में की गई है। टीम ने अधिकारी से जुड़े ठिकानों पर दस्तावेज, संपत्ति संबंधी कागजात और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड खंगाले। प्रारंभिक जांच में सामने आई संपत्तियों और अधिकारी की वैध आय के बीच बड़ा अंतर पाया गया है।


31 साल की नौकरी, संपत्ति में इतना बड़ा अंतर


मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि करीब तीन दशक से अधिक की सेवा अवधि में अधिकारी की कुल ज्ञात आय लगभग 80 लाख रुपये आंकी गई, लेकिन जांच में करीब 2.53 करोड़ रुपये की संपत्ति सामने आने का दावा किया गया है। यानी सवाल सिर्फ संपत्ति की मात्रा का नहीं, बल्कि आय और संपत्ति के बीच इतने बड़े अंतर के स्रोत का है।


लोकायुक्त अब यह पता लगाने में जुटी है कि संपत्तियां किस समय खरीदी गईं, उनका वास्तविक मूल्य क्या था और उनके भुगतान के लिए धन का स्रोत क्या रहा। जांच में चल-अचल संपत्ति के साथ बैंक खातों और अन्य वित्तीय लेन-देन की भी पड़ताल महत्वपूर्ण होगी।


राजस्व विभाग फिर सवालों के घेरे में


नगर निगम में राजस्व विभाग सीधे तौर पर संपत्ति कर, कर निर्धारण और राजस्व वसूली जैसे महत्वपूर्ण कामों से जुड़ा है। ऐसे विभाग के अधिकारी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की कार्रवाई होना निगम की आंतरिक निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।


हालांकि, लोकायुक्त की प्रारंभिक जांच में संपत्ति का असंतुलन सामने आना अपने आप में दोष सिद्धि नहीं है। आगे की जांच में संपत्तियों के वैध स्रोत और आय के दस्तावेजों का परीक्षण होगा। यदि आय से अधिक संपत्ति का आरोप प्रमाणित होता है, तो मामला भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत आगे बढ़ सकता है।


बड़ा सवाल


नगर निगम में वर्षों तक पद पर रहते हुए किसी अधिकारी की संपत्ति उसकी ज्ञात आय से कई गुना बढ़ती रही तो विभागीय निगरानी तंत्र को इसकी भनक क्यों नहीं लगी?


लोकायुक्त की कार्रवाई ने इस सवाल को फिर सामने ला दिया है कि नगर निगम में अधिकारियों की संपत्ति और उनके वित्तीय हितों की नियमित निगरानी कितनी प्रभावी है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि जांच में 2.53 करोड़ रुपये की संपत्ति का वास्तविक स्रोत क्या निकलता है और जिम्मेदारी केवल अधिकारी तक सीमित रहती है या निगरानी व्यवस्था की भूमिका भी जांच के दायरे में आती है।

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