भोपाल में ब्रिक्स देशों के सांस्कृतिक कार्य समूह और संस्कृति मंत्रियों का सम्मेलन केवल एक औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक कूटनीति की परीक्षा भी है। जब दुनिया आर्थिक और सामरिक समीकरणों के साथ सांस्कृतिक प्रभाव की प्रतिस्पर्धा में भी उतर चुकी है, तब भारत के लिए अपनी हजारों वर्ष पुरानी विरासत को वैश्विक मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना एक बड़ी जिम्मेदारी है।
सम्मेलन में लंदन से वाग्देवी प्रतिमा की वापसी जैसे विषय चर्चा के केंद्र में हैं। यह केवल एक मूर्ति की वापसी का मामला नहीं, बल्कि उन हजारों भारतीय पुरावशेषों की कहानी है जो वर्षों पहले देश से बाहर चले गए। सवाल यह है कि क्या सरकार केवल प्रतीकात्मक सफलताओं तक सीमित रहेगी या विदेशों में मौजूद सभी भारतीय धरोहरों की व्यवस्थित वापसी के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनाएगी?
भारत आज अपनी सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की बात करता है। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि देश के भीतर मौजूद ऐतिहासिक स्मारकों, संग्रहालयों और पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण पर भी उतना ही ध्यान दिया जाए। यदि अपनी विरासत सुरक्षित नहीं होगी तो विश्व नेतृत्व का दावा अधूरा रह जाएगा।
ब्रिक्स मंच भारत को केवल संस्कृति नहीं, बल्कि पर्यटन, शिक्षा, शोध, रचनात्मक उद्योगों और सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का अवसर भी देता है। ऐसे सम्मेलनों का वास्तविक लाभ तभी होगा जब इनके निर्णय कागजों से निकलकर जमीन पर दिखाई दें और सांस्कृतिक सहयोग निवेश, रोजगार तथा वैश्विक साझेदारी में भी परिवर्तित हो।
भोपाल की यह बैठक भारत के लिए अवसर है कि वह दुनिया को अपनी सभ्यता की ताकत दिखाए। लेकिन सम्मेलन की सफलता भाषणों या तस्वीरों से नहीं, बल्कि उन ठोस परिणामों से तय होगी जो भारत की सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा, वापसी और वैश्विक प्रतिष्ठा को वास्तविक मजबूती दें।

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