करोड़ों का बजट, फिर भी डूबे शहर… दिल्ली से गुरुग्राम तक जलसैलाब, पहाड़ों पर भी ‘हाहाकार’

 

नई दिल्ली। बारिश ने एक बार फिर देश के बड़े शहरों की जल निकासी व्यवस्था और शहरी नियोजन की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। दिल्ली-एनसीआर से लेकर पहाड़ी इलाकों तक भारी बारिश के बाद जलभराव, यातायात बाधित होने और जनजीवन प्रभावित होने की तस्वीरें सामने आती रही हैं। ऐसे में सवाल केवल बारिश की तीव्रता का नहीं, बल्कि हर साल जल निकासी, नालों की सफाई और शहरी बुनियादी ढांचे पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपये की उपयोगिता का भी है।



बारिश आते ही क्यों डूबते हैं शहर?


शहरों के तेजी से फैलने के साथ कंक्रीट का क्षेत्र बढ़ा है। जमीन पर पानी के प्राकृतिक रूप से रिसने की क्षमता कम हुई है। दूसरी ओर कई इलाकों में पुराने नाले बढ़ती आबादी और बदलते निर्माण के अनुरूप पर्याप्त क्षमता वाले नहीं हैं।


जब कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होती है तो नालों और जल निकासी प्रणालियों पर दबाव बढ़ जाता है। नतीजा—सड़कें तालाब में बदल जाती हैं और कई इलाकों में घरों तथा दुकानों तक पानी पहुंच जाता है।


करोड़ों के बजट पर बड़ा सवाल


हर वर्ष नगर निकायों और विभिन्न सरकारी एजेंसियों की ओर से नाला सफाई, सड़क निर्माण, जल निकासी, पंपिंग स्टेशन और शहरी विकास पर बड़ी रकम खर्च की जाती है। इसके बावजूद बारिश के दौरान वही इलाके बार-बार जलभराव की चपेट में क्यों आते हैं?


यहीं से एक अहम सवाल उठता है—क्या समस्या बजट की कमी है या योजना और क्रियान्वयन की?


किसी भी परियोजना का वास्तविक मूल्य केवल स्वीकृत बजट से नहीं, बल्कि उसके परिणाम से तय होना चाहिए। यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी बारिश के कुछ घंटों में प्रमुख सड़कें और बस्तियां जलमग्न हो जाएं तो जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है।


स्मार्ट शहर, लेकिन पानी निकासी की पुरानी समस्या


शहरों को आधुनिक बनाने के नाम पर स्मार्ट यातायात, सड़क, सौंदर्यीकरण और डिजिटल सेवाओं पर जोर दिया जाता है। लेकिन बुनियादी जल निकासी व्यवस्था कमजोर रहने पर आधुनिक परियोजनाओं का लाभ सीमित हो जाता है।


शहरी नियोजन में जल निकासी, जलाशयों का संरक्षण, प्राकृतिक नालों की सुरक्षा और वर्षा जल के संचयन को प्राथमिकता देना जरूरी है।


पहाड़ी इलाकों में चुनौती और बड़ी


पहाड़ों में अत्यधिक बारिश के साथ भूस्खलन, अचानक बाढ़ और सड़क क्षति का खतरा बढ़ जाता है। यहां केवल नालों की सफाई से समस्या हल नहीं होगी। निर्माण गतिविधियों, ढलानों की स्थिरता और प्राकृतिक जलधाराओं के संरक्षण को भी विकास योजनाओं का हिस्सा बनाना होगा।


अब जवाबदेही की जरूरत


हर साल बारिश के बाद जलभराव पर चर्चा होती है और फिर कुछ दिनों बाद मामला शांत हो जाता है। जरूरत इस बात की है कि बारिश से पहले किए गए नाला-सफाई कार्यों का स्वतंत्र निरीक्षण हो, खर्च का सार्वजनिक विवरण जारी हो और बार-बार जलभराव वाले स्थानों की स्थायी योजना बनाई जाए।


सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी शहर हर बारिश में डूब रहे हैं, तो आखिर कमी कहां है—बजट में, योजना में, निगरानी में या जवाबदेही में?

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