संपादकीय | प्रणव बजाज
14 अगस्त 1947 की रात भारत केवल अंग्रेजी हुकूमत से आजाद होने की तैयारी नहीं कर रहा था। एक ऐसा भारत जन्म लेने वाला था, जिसकी कल्पना में सत्ता जनता की होगी, शासन जवाबदेह होगा और राजनीति का उद्देश्य देश का निर्माण होगा।
आज, आजादी के 80वें वर्ष की दहलीज पर खड़े होकर उस रात को याद करना इसलिए जरूरी है कि हम खुद से एक असहज सवाल पूछ सकें—अंग्रेज चले गए, लेकिन क्या शासन की वह मानसिकता भी चली गई, जिसके खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ी गई थी?
उस रात संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि आजादी का अर्थ केवल सत्ता हासिल करना नहीं है। भारत की सेवा का अर्थ करोड़ों गरीबों, वंचितों, बीमारों और अवसर से दूर लोगों की सेवा करना है।
आज यही वाक्य सबसे बड़ा आईना है।
आजादी के समय देश के पास संसाधन कम थे, लेकिन लक्ष्य बड़ा था। आज संसाधन कहीं अधिक हैं, योजनाएं बड़ी हैं, बजट हजारों करोड़ का है और तकनीक हाथ में है। फिर भी सवाल वहीं खड़ा है—जिस आखिरी व्यक्ति तक विकास पहुंचाने का सपना था, क्या वह वास्तव में वहां पहुंचा?
उस रात विभाग बांटे जा रहे थे, आज हिस्से बांटे जाने का आरोप क्यों?
1947 में पहली सरकार बन रही थी। नेहरू के पास विदेश मामले, पटेल के पास गृह और रियासतें, आंबेडकर के पास कानून, राजेंद्र प्रसाद के पास खाद्य एवं कृषि, बलदेव सिंह के पास रक्षा, राजकुमारी अमृत कौर के पास स्वास्थ्य और अन्य नेताओं के पास देश के निर्माण से जुड़े महत्वपूर्ण विभाग थे।
यह केवल मंत्रालयों की सूची नहीं थी। यह उस नवजात राष्ट्र की प्राथमिकताओं का दस्तावेज था।
आज भी मंत्रालय हैं, मंत्री हैं, बजट हैं और योजनाएं हैं। फर्क सिर्फ इतना पूछने का है कि क्या प्राथमिकताएं भी उतनी ही स्पष्ट हैं?
आज सड़क की लागत पर सवाल उठता है तो ठेकेदार सामने आता है। भर्ती में गड़बड़ी हो तो दलाल का नाम आता है। परीक्षा में पेपर लीक हो तो सिंडिकेट सामने आता है। सरकारी जमीन पर सवाल हो तो फाइलें घूमती हैं।
फिर सवाल उठता है—व्यवस्था की जवाबदेही आखिर तय कौन करेगा?
आजादी का अर्थ सिर्फ झंडा नहीं था
14 अगस्त की रात नेहरू ने जिस भारत की कल्पना की थी, उसमें गरीबी, अज्ञानता, बीमारी और असमानता से लड़ना स्वतंत्रता का हिस्सा था।
आज हम दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में हैं। अंतरिक्ष में पहुंच रहे हैं। डिजिटल भारत की चर्चा दुनिया कर रही है। राजमार्ग बन रहे हैं, रेल बदल रही है, शहरों में मेट्रो दौड़ रही है।
लेकिन उसी भारत में किसान आत्महत्या करता है, युवा परीक्षा देकर वर्षों परिणाम का इंतजार करता है, गरीब इलाज के लिए लाइन में खड़ा रहता है और सरकारी कार्यालय में एक साधारण काम के लिए भी व्यवस्था से लड़ना पड़ता है।
तो विकास हुआ है, इसमें संदेह नहीं। लेकिन क्या विकास का लाभ समान रूप से पहुंचा है—यह सवाल पूछना भी देशभक्ति है।
1947 में सत्ता जनता के नाम हुई थी
अंग्रेजों की सत्ता चली गई। भारतीयों ने शासन संभाला। लेकिन लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है।
लोकतंत्र का अर्थ है—सत्ता से सवाल।
सरकार किसी भी दल की हो, मुख्यमंत्री कोई भी हो, प्रधानमंत्री कोई भी हो—जनता को सवाल पूछने का अधिकार रहना चाहिए। मीडिया को सवाल पूछने की आजादी रहनी चाहिए। संस्थाओं को सत्ता से ऊपर संविधान के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।
आज सबसे बड़ा खतरा यही है कि हम सरकार और राष्ट्र को एक ही समझने की भूल न करें।
सरकार बदल सकती है। दल बदल सकते हैं। मंत्री बदल सकते हैं। लेकिन राष्ट्र और संविधान उससे कहीं बड़े हैं।
उस रात नेताओं ने भविष्य देखा था, आज हमें हिसाब देखना होगा
1947 में भारत के पास भविष्य का सपना था।
2026 में हमारे पास अतीत का अनुभव भी है।
इसलिए अब केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि देश ने 80 वर्षों में क्या हासिल किया। यह भी पूछना होगा कि कहां चूके, क्यों चूके और जिम्मेदार कौन था?
आजादी की 80वीं वर्षगांठ पर सबसे बड़ा उत्सव शायद यही होगा कि हम तिरंगे को सलाम करने के साथ-साथ उस नागरिक को भी सम्मान दें जो सत्ता से सवाल पूछता है।
क्योंकि 14 अगस्त 1947 की रात भारत केवल आजाद नहीं हुआ था।
भारत को एक जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
वह जिम्मेदारी थी—ऐसा गणराज्य बनाना जहां सत्ता जनता की हो, कानून सबके लिए बराबर हो और शासन का अंतिम लाभ उस व्यक्ति तक पहुंचे जिसके पास अपनी आवाज को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने का कोई साधन नहीं।
80 साल बाद सवाल अंग्रेजों से नहीं है। सवाल हमसे है—क्या हमने उस आजादी को सुराज में बदला?
और अगर जवाब अधूरा है, तो तिरंगे के सामने खड़े होकर अगला संकल्प यही होना चाहिए—
आजादी बचानी ही नहीं है, उसे जनता के जीवन में उतारना भी है।

Post a Comment