हरिद्वार। इस वर्ष कांवड़ यात्रा में आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संदेश भी देखने को मिल रहा है। हरिद्वार से विभिन्न शिवालयों की ओर जल लेकर रवाना हो रहे शिवभक्त अब प्लास्टिक की बजाय बांस, जूट, लकड़ी, कपड़े, फूल-पौधों और अन्य प्राकृतिक सामग्री से बनी कांवड़ का उपयोग कर रहे हैं।
पर्यावरण-अनुकूल कांवड़ न केवल आकर्षण का केंद्र बनी हैं, बल्कि लोगों को प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक भी कर रही हैं। कई श्रद्धालुओं का कहना है कि भगवान शिव स्वयं प्रकृति के प्रतीक हैं, इसलिए उनकी आराधना भी पर्यावरण के अनुकूल साधनों से ही होनी चाहिए।
इस पहल से प्लास्टिक कचरे में कमी आने की उम्मीद है। साथ ही स्थानीय कारीगरों और हस्तशिल्प से जुड़े लोगों को भी रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं। प्राकृतिक सामग्री से बनी कांवड़ हल्की, सुंदर और आसानी से नष्ट होने वाली होने के कारण पर्यावरण पर भी कम प्रभाव डालती हैं।
कांवड़ यात्रा का यह बदलता स्वरूप बताता है कि आस्था और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। शिवभक्तों का यह प्रयास समाज को स्वच्छता, हरियाली और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभाने का प्रेरक संदेश दे रहा है।

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