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पशुपालन विभाग में फर्जी हाजिरी, एफआईआर आदेश और गायब पत्र का रहस्य

 

इंदौर। विशेष संवाददाता

मध्य प्रदेश के पशुपालन विभाग में कथित फर्जी हाजिरी, शासकीय धन के दुरुपयोग और विभागीय कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सोशल मीडिया और स्थानीय समाचारों में सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, विभाग की दो महिला चिकित्सकों पर सार्थक ऐप के माध्यम से कथित फर्जी उपस्थिति दर्ज कर शासन को आर्थिक नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए गए हैं। आरोप यह भी है कि इन शिकायतों के आधार पर एफआईआर दर्ज कराने संबंधी एक आदेश भोपाल से जारी हुआ, लेकिन उसकी प्रति इंदौर स्तर तक नहीं पहुंची। इन दावों की स्वतंत्र सरकारी पुष्टि अभी शेष है।


प्रमुख सवाल

यदि एफआईआर के निर्देश जारी हुए थे, तो उनका पालन क्यों नहीं हुआ?

आदेश की प्रति बीच रास्ते में कैसे गायब हो गई?

क्या विभागीय स्तर पर किसी ने कार्रवाई रोकने की कोशिश की?

संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होगी या नहीं?

पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी या नहीं?

दस्तावेजों से क्या संकेत मिलते हैं?

सामने आए पत्रों में 24 अप्रैल 2026 की तारीख का उल्लेख है। दावा किया गया है कि संबंधित अधिकारियों को कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे, लेकिन आदेश की प्रति स्थानीय कार्यालय तक नहीं पहुंची। यदि यह दावा सही है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर विभागीय अनियमितता का मामला भी हो सकता है। आरोपों की पुष्टि सक्षम जांच एजेंसियों द्वारा होना बाकी है।

विभाग पहले भी विवादों में

हाल के दिनों में मध्य प्रदेश के पशुपालन विभाग में तबादलों और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर भी विवाद सामने आए हैं। कई अधिकारियों ने स्थानांतरण नीति के उल्लंघन और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है, जिससे विभाग पहले से ही सवालों के घेरे में है। 

निष्पक्ष जांच की आवश्यकता

यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल फर्जी हाजिरी का नहीं, बल्कि सरकारी आदेशों के पालन, प्रशासनिक जवाबदेही और शासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। दूसरी ओर, यदि आरोप निराधार हैं, तो संबंधित अधिकारियों को भी निष्पक्ष जांच के माध्यम से स्पष्ट राहत मिलनी चाहिए।

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