भोपाल। मध्य प्रदेश में आंगनवाड़ी व्यवस्था से जुड़ा पोषण संकट अब केवल आपूर्ति की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य पर सीधा असर डालने वाला गंभीर प्रशासनिक सवाल बन गया है। प्रदेश में 97,882 आंगनवाड़ी केंद्र 453 बाल विकास परियोजनाओं के माध्यम से संचालित हैं। सरकार ने सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0 योजना को वर्ष 2030-31 तक जारी रखने की मंजूरी भी दी है।
केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के मुताबिक पूरक पोषण आहार साल में न्यूनतम 300 दिन उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसमें सुबह का नाश्ता, गर्म पका भोजन और घर ले जाने वाला राशन शामिल है।
लेकिन जुलाई 2026 में सामने आई रिपोर्टों ने आपूर्ति व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। प्रदेश के पोषण आहार तैयार करने वाले सात संयंत्र बंद होने और कई इलाकों में आहार वितरण प्रभावित होने की जानकारी सामने आई। स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं ने भुगतान और रोजगार प्रभावित होने की शिकायत भी की है।
सबसे चिंताजनक संकेत एनएफएचएस-6 से मिलते हैं। मध्य प्रदेश में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में कम वजन की दर 33 प्रतिशत से बढ़कर 39.7 प्रतिशत और दुबलापन यानी वेस्टिंग 18.9 प्रतिशत से बढ़कर 23.8 प्रतिशत हो गया। ठिगनेपन की दर 35.7 प्रतिशत से घटकर 31.4 प्रतिशत जरूर हुई, लेकिन लगभग हर तीसरा बच्चा अब भी इससे प्रभावित है।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि आहार कितने दिन मिला। बड़ा सवाल यह है कि जब कुपोषण के आंकड़े चिंता बढ़ा रहे हैं, तब पोषण की आपूर्ति व्यवस्था बार-बार क्यों लड़खड़ा रही है?
सरकार को जिला-वार आपूर्ति, बंद संयंत्र, बकाया भुगतान और वास्तविक वितरण के आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। क्योंकि कागज पर चल रही आंगनवाड़ी और जमीन पर पहुंच रहा पोषण—दोनों एक चीज नहीं हैं।

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