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73 लाख मतदाताओं के नाम पर घमासान, पंजाब में 20 लाख नाम हटे; रेड्डी ने अपने ही नेताओं को घेरा

तेलंगाना में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। राज्य में 73.39 लाख मतदाताओं के गणना प्रपत्र एकत्र नहीं हो सके हैं, जिसके बाद इन नामों के मसौदा मतदाता सूची से बाहर होने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि इन्हें अभी अंतिम रूप से हटाया गया नाम कहना सही नहीं होगा। निर्वाचन अधिकारियों के अनुसार इन प्रपत्रों की स्थिति अलग-अलग कारणों से दर्ज की गई है।



आंकड़ों के मुताबिक तेलंगाना में कुल 3.38 करोड़ मतदाता हैं। इनमें से करीब 2.65 करोड़ मतदाताओं के प्रपत्रों का डिजिटलीकरण हो चुका है, जबकि 73.39 लाख प्रपत्र एकत्र नहीं हो सके। इनमें करीब 45.1 लाख मतदाता स्थायी रूप से दूसरी जगह चले गए, 11.2 लाख अनुपस्थित या पता नहीं चलने वाले, 9.2 लाख मृत और 6.7 लाख पहले से पंजीकृत श्रेणी में बताए गए हैं।


मामला इसलिए भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो गया है क्योंकि मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने अपने ही पार्टी संगठन को लेकर नाराजगी जताई है। उन्होंने आरोप लगाया है कि विपक्षी दलों की ओर से मतदाता सूची में हेरफेर की कोशिश हो सकती है और कांग्रेस कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर पर पूरी जिम्मेदारी के साथ काम करने को कहा है। इससे पहले उन्होंने आरोप लगाया था कि भाजपा और भारत राष्ट्र समिति कांग्रेस समर्थक मतदाताओं के नाम हटाने की साजिश कर रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।


रेड्डी ने अपने नेताओं से सवाल किया है कि जब मतदाता सूची में इतनी बड़ी संख्या में नाम संदिग्ध स्थिति में पहुंच रहे थे, तब पार्टी का बूथ स्तर का संगठन क्या कर रहा था। कांग्रेस ने अब निर्वाचन अधिकारी से इन 73.3 लाख मतदाताओं का बूथवार विवरण मांगा है, ताकि उसके कार्यकर्ता वास्तविक स्थिति की दोबारा जांच कर सकें।


उधर पंजाब में विशेष गहन पुनरीक्षण के मसौदा मतदाता सूची में करीब 20.66 लाख नाम हटाए गए हैं। पंजाब में यह आंकड़ा अब सीधे राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है।


दोनों राज्यों के आंकड़े एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं—मतदाता सूची को शुद्ध करने की प्रक्रिया में वास्तविक मृत, स्थानांतरित और दोहरे नाम हटाना जरूरी है, लेकिन यदि वास्तविक मतदाता भी सूची से बाहर हो गए तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?


तेलंगाना में 17 अगस्त को मसौदा मतदाता सूची आने के बाद असली तस्वीर सामने आएगी। उसके बाद यह पता चलेगा कि 73.39 लाख मामलों में कितने नाम वास्तव में हटते हैं और कितने मतदाता दावे-आपत्तियों के जरिए वापस सूची में आते हैं।


सबसे बड़ा सवाल:

क्या राजनीतिक दल बूथ स्तर पर अपने मतदाताओं की निगरानी में विफल रहे, या पुनरीक्षण प्रक्रिया में इतनी बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के छूट जाने का जोखिम पैदा हुआ? इसका जवाब मसौदा सूची और उसके बाद होने वाली दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया से ही मिलेगा।

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