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23 हजार शिकायतें, हजारों जांच और फिर भी सजा कितनी? मोहन सरकार के सामने भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा आईना !

 

प्रणव बजाज

भोपाल। मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का दावा विधानसभा में पेश आंकड़ों के सामने कई गंभीर सवाल खड़े करता है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सामान्य प्रशासन विभाग से जुड़े सवालों के जवाब में लोकायुक्त और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ के आंकड़े सदन में रखे। इन आंकड़ों में शिकायतों की बड़ी संख्या, जांच की धीमी रफ्तार, अभियोजन स्वीकृति की लंबित फाइलें और अदालतों में लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों की तस्वीर सामने आती है।



सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ यानी ईओडब्ल्यू से जुड़ा है। 2020 से जून 2026 तक ईओडब्ल्यू को 23,261 शिकायतें मिलीं। इनमें 3,018 शिकायतें दर्ज की गईं और 756 मामलों को नस्तीबद्ध किया गया। उपलब्ध आंकड़ों को लेकर सवाल यह है कि शेष 19,487 शिकायतों की स्थिति क्या रही? विपक्ष ने विधानसभा में इसी बिंदु पर सरकार से जवाब मांगा है।


मोहन सरकार के लिए सवाल इसलिए बड़ा है


यहां एक तथ्य स्पष्ट रखना जरूरी है। 23,261 शिकायतों का पूरा आंकड़ा वर्ष 2020 से जून 2026 तक का है। इसमें पिछली सरकार का कार्यकाल भी शामिल है। डॉ. मोहन यादव ने दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री पद संभाला। इसलिए पूरे आंकड़े को केवल मोहन सरकार के कार्यकाल का भ्रष्टाचार कहना सही नहीं होगा।


लेकिन दिसंबर 2023 के बाद सामने आए आंकड़े सरकार की जवाबदेही से सीधे जुड़े हैं। खासकर तब, जब सरकार स्वयं भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई और पारदर्शी प्रशासन का दावा करती है।


97 प्रतिशत शिकायतें एफआईआर तक क्यों नहीं पहुंचीं?


ईओडब्ल्यू के 2020 से जनवरी 2026 तक के पहले उपलब्ध विधानसभा आंकड़ों में 19,775 शिकायतों में से केवल 2,624 शिकायतें दर्ज हुई थीं और 566 मामलों में अपराध पंजीबद्ध हुआ था। यानी शिकायतों की बड़ी संख्या आपराधिक मुकदमे तक नहीं पहुंची।


बाद में जून 2026 तक शिकायतों की संख्या बढ़कर 23,261 हो गई। 3,018 शिकायतें दर्ज होने और 756 के नस्तीबद्ध होने के बाद भी बड़ी संख्या में शिकायतों की स्थिति पर राजनीतिक सवाल उठना स्वाभाविक है।


सवाल सीधा है—क्या भ्रष्टाचार की शिकायत करने वाला नागरिक सिर्फ शिकायत नंबर लेकर बैठा रहे, या उसे कार्रवाई का परिणाम भी दिखाई देगा?


अदालत में सजा की रफ्तार और भी चिंताजनक


ईओडब्ल्यू के जिन 70 आपराधिक मामलों में अदालत का फैसला आया, उनमें 40 मामलों में दोषसिद्धि और 30 में बरी होने की जानकारी सामने आई। कागज पर दोषसिद्धि दर करीब 57 प्रतिशत दिखाई देती है।


लेकिन असली समस्या फैसला आने में लगने वाला समय है। इन मामलों में निर्णय तक पहुंचने में औसतन 13 साल 7 महीने लगे। कुछ मामलों में 26 से 33 वर्ष तक का समय लगा। यानी भ्रष्टाचार के आरोपी के खिलाफ कार्रवाई का अंतिम परिणाम आने तक एक पूरी पीढ़ी बदल सकती है।


यहां सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल है—अगर भ्रष्टाचार के मामले में फैसला 20-30 साल बाद आएगा तो तत्काल कार्रवाई और कानून का डर कितना प्रभावी रहेगा?


लोकायुक्त में जांच से ज्यादा बड़ी समस्या है अभियोजन स्वीकृति


लोकायुक्त के उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 31 मई 2026 तक 346 प्रकरण अभियोजन स्वीकृति के लिए लंबित थे। अप्रैल से जून 2026 की अवधि जोड़ने के बाद लंबित संख्या 352 तक दर्ज है।


यानी जांच एजेंसी अपनी कार्रवाई पूरी करने के बाद भी कई मामलों में अदालत तक पहुंचने के लिए सरकारी स्वीकृति की प्रतीक्षा करती है।


यही वह जगह है जहां भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रशासनिक इच्छाशक्ति की असली परीक्षा होती है।


जांच पूरी होने के बावजूद यदि अभियोजन स्वीकृति वर्षों तक लंबित रहे तो आरोपी के खिलाफ मुकदमा शुरू होने में ही देरी हो जाती है।


लोकायुक्त के आंकड़े भी सरकार को आईना दिखाते हैं


लोकायुक्त की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में विशेष पुलिस स्थापना के मामलों में 208 प्रकरण अभियोजन स्वीकृति के लिए भेजे गए, 190 में स्वीकृति प्राप्त हुई और वर्ष के अंत में 346 प्रकरण लंबित थे। अप्रैल-जून 2026 में 47 मामले भेजे गए और 49 में स्वीकृति प्राप्त हुई, लेकिन लंबित संख्या 352 तक पहुंची।


इसका मतलब यह नहीं कि सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। बल्कि समस्या यह है कि कार्रवाई की पूरी श्रृंखला—शिकायत से जांच, जांच से चालान और चालान से सजा—एक समान गति से नहीं चल रही।


20.97 करोड़ की वसूली, लेकिन सवाल सजा का


उपलब्ध रिपोर्टों में लोकायुक्त से जुड़े मामलों में करीब 20.97 करोड़ रुपये की वसूली का उल्लेख है। साथ ही 208 मामलों में न्यायालय में चालान पेश होने और 134 मामलों के अभियोजन स्वीकृति में लंबित होने की जानकारी सामने आई थी।


इससे तस्वीर का दूसरा पहलू सामने आता है—जांच एजेंसियां कार्रवाई कर रही हैं, लेकिन अदालत में अंतिम परिणाम तक पहुंचने की रफ्तार बेहद धीमी है।


मोहन सरकार से पांच बड़े सवाल


पहला— जून 2026 तक ईओडब्ल्यू के पास पहुंचीं 23,261 शिकायतों में से 19,487 की स्थिति क्या है?


दूसरा— जांच पूरी होने के बाद अभियोजन स्वीकृति की फाइलें महीनों और वर्षों तक क्यों अटकती हैं?


तीसरा— भ्रष्टाचार के मामलों में औसतन 13 साल 7 महीने की न्यायिक देरी को खत्म करने के लिए सरकार ने क्या ठोस व्यवस्था बनाई है?


चौथा— जिन मामलों में जांच एजेंसी को भ्रष्टाचार के प्रथमदृष्टया प्रमाण मिलते हैं, उनमें आरोप-पत्र और दोषसिद्धि की दर इतनी कम क्यों है?


पांचवां— सरकार भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा करती है तो शिकायतकर्ता को कार्रवाई का अंतिम परिणाम समयबद्ध तरीके से क्यों नहीं मिलता?


छापे और शिकायतों से आगे बढ़ना होगा


मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का मतलब केवल छापे, गिरफ्तारी या जांच शुरू करना नहीं हो सकता। असली कसौटी तब होगी जब शिकायतकर्ता को न्याय मिले, दोषी अधिकारी पर समयबद्ध मुकदमा चले, अवैध संपत्ति की वसूली हो और अदालत से अंतिम सजा भी मिले।


सरकारी आंकड़े यह साबित नहीं करते कि मोहन सरकार के कार्यकाल में पूरा प्रशासन भ्रष्टाचार में डूब गया है। लेकिन वे इतना जरूर दिखाते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यवस्था में शिकायतों की बड़ी संख्या और अंतिम न्याय के बीच भारी अंतर मौजूद है।


और यही अंतर मोहन सरकार के लिए सबसे असहज सवाल बनकर सामने आया है—


“शिकायतें हजारों में, जांच सैकड़ों में और अंतिम सजा इतनी कम क्यों?”


बौद्धिक प्रतिकार की पड़ताल: भ्रष्टाचार के खिलाफ असली लड़ाई आंकड़ों में कार्रवाई दिखाने से नहीं, बल्कि आरोपी को कानून के अंतिम पड़ाव तक पहुंचाने से जीती जाती है।

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