नई दिल्ली। देश की राजनीति में आपराधिक मामलों को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सुप्रीम कोर्ट के सामने आई है। अदालत में पेश की गई ताजा स्थिति रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा 326 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। इनमें लोकसभा के 251 और राज्यसभा के 75 सांसद शामिल हैं। इसके अलावा देश के 28 में से 14 मुख्यमंत्रियों ने भी अपने चुनावी हलफनामों में गंभीर आपराधिक मामलों की जानकारी घोषित की है।
यह आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं, जब सुप्रीम कोर्ट सांसदों और विधायकों से जुड़े आपराधिक मामलों के जल्द निपटारे के मुद्दे पर सुनवाई कर रहा है। अदालत के समक्ष पेश रिपोर्ट में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित मामलों की बड़ी संख्या को लेकर चिंता जताई गई है। इससे सवाल उठता है कि अगर किसी जनप्रतिनिधि पर गंभीर आपराधिक मुकदमा वर्षों तक चलता रहे तो उसका अंतिम फैसला कब होगा?
मामले में न्याय मित्र ने सुझाव दिया है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों की सुनवाई के लिए विशेष या नामित अदालतों की व्यवस्था की जाए और मुकदमों को तेजी से निपटाने का प्रयास किया जाए। रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की संख्या 4 हजार से अधिक है।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी ऐसे मामलों की सुनवाई तेजी से कराने के लिए विशेष अदालतों की व्यवस्था पर जोर दे चुका है। अब अदालत के सामने चुनौती यह है कि व्यवस्था ऐसी हो जिसमें न तो किसी आरोपी जनप्रतिनिधि के साथ अन्याय हो और न ही गंभीर मामलों का फैसला वर्षों तक टलता रहे।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—आपराधिक मामला लंबित होना दोष सिद्ध होना नहीं है। किसी व्यक्ति को अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने तक वह कानून की नजर में आरोपी ही होता है।
फिर भी आंकड़े लोकतंत्र के लिए बड़ा सवाल जरूर खड़ा करते हैं—जनप्रतिनिधियों के खिलाफ मुकदमे लंबित रहेंगे तो जनता को अंतिम न्याय कितनी जल्दी मिलेगा? सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा सुनवाई इसी सवाल का जवाब तलाशने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।

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