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मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में लगातार घटते मैंग्रोव जंगलों को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने गहरी चिंता जताते हुए प्रशासन और संबंधित एजेंसियों को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि केवल औपचारिकता निभाने या फोटो खिंचवाने के लिए पौधे लगाने से पर्यावरण नहीं बचेगा। यदि विकास के नाम पर पेड़ों और मैंग्रोव का विनाश जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब लोगों को सांस लेने के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर साथ लेकर चलना पड़े।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मैंग्रोव केवल पेड़ नहीं, बल्कि तटीय क्षेत्रों की प्राकृतिक सुरक्षा कवच हैं। ये बाढ़, समुद्री कटाव और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के साथ-साथ जैव विविधता और वायु गुणवत्ता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके अंधाधुंध विनाश के गंभीर पर्यावरणीय परिणाम सामने आ सकते हैं।
हाई कोर्ट ने अधिकारियों से पूछा कि यदि विकास परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय नियम बनाए गए हैं, तो उनका पालन क्यों नहीं हो रहा। अदालत ने स्पष्ट किया कि विकास आवश्यक है, लेकिन वह पर्यावरण की कीमत पर नहीं हो सकता। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए।
अदालत की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब मुंबई महानगर क्षेत्र में शहरी विस्तार और आधारभूत परियोजनाओं के कारण मैंग्रोव क्षेत्रों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि मैंग्रोव के घटने से बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, समुद्री पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है और शहर की वायु गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
हाई कोर्ट ने संकेत दिया कि पर्यावरण संरक्षण केवल कागजी योजनाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पेड़ों और मैंग्रोव की वास्तविक सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और स्थानीय निकायों की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

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