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भ्रष्टाचार का वीआईपी क्लब!

सिर्फ 8% बड़े अफसर, लेकिन 25% भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपी

प्रणव बजाज

949 करोड़ की कथित अवैध संपत्ति उजागर, 962 छापों के बाद भी नहीं थम रहा भ्रष्टाचार




मध्य प्रदेश के सरकारी तंत्र पर लोकायुक्त संगठन की रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के कुल सरकारी कर्मचारियों में राजपत्रित अधिकारियों की संख्या महज 8 प्रतिशत है, लेकिन भ्रष्टाचार के मामलों में उनकी हिस्सेदारी लगभग 25 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यानी भ्रष्टाचार के हर चार आरोपियों में एक बड़ा अधिकारी है। यह स्थिति बताती है कि प्रशासन के शीर्ष स्तर पर जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं।


लोकायुक्त संगठन के 1982 से मई 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार भ्रष्टाचार के कुल 7,717 मामले दर्ज किए गए। इनमें 1,954 राजपत्रित अधिकारी आरोपी हैं। प्रदेश में कुल लगभग 6.07 लाख सरकारी कर्मचारी हैं, जबकि राजपत्रित अधिकारियों की संख्या करीब 50 हजार है। संख्या कम होने के बावजूद इन अधिकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों का अनुपात कहीं अधिक है।


962 छापे, 949 करोड़ की कथित अवैध संपत्ति


रिपोर्ट के अनुसार अब तक 962 छापों के दौरान लगभग 949 करोड़ रुपये की कथित अवैध संपत्ति का खुलासा हुआ है। औसतन प्रत्येक छापे में करीब 98 लाख रुपये की संपत्ति सामने आई। पिछले दो दशकों में ही लगभग 789 करोड़ रुपये की संपत्ति पकड़ी गई। वर्ष 2011-12 में सबसे अधिक 41 छापे पड़े, जिनमें करीब 106 करोड़ रुपये की संपत्ति का खुलासा हुआ।


हर चौथा आरोपी बड़ा अफसर


आंकड़ों के अनुसार राजपत्रित अधिकारियों पर दर्ज अधिकांश मामले आय से अधिक संपत्ति, रिश्वतखोरी, पद के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े हैं। कई मामलों की सुनवाई न्यायालयों में लंबित है, जबकि कुछ मामलों में जांच अभी भी जारी है।


केवल बड़े अफसर ही नहीं, अन्य कर्मचारी भी जांच के दायरे में


लोकायुक्त के रिकॉर्ड बताते हैं कि अराजपत्रित कर्मचारियों के खिलाफ भी 5,763 मामले दर्ज हुए हैं। अन्य श्रेणी के कर्मचारियों के विरुद्ध भी सैकड़ों मामले दर्ज हैं। हालांकि कुल कर्मचारियों की तुलना में राजपत्रित अधिकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों का अनुपात अधिक होने से प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं।


तीन एजेंसियां, फिर भी भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं


प्रदेश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए लोकायुक्त, आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) और जिला पुलिस बल जैसी एजेंसियां कार्यरत हैं। इसके बावजूद लगातार सामने आ रहे मामले यह संकेत देते हैं कि भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगाने की दिशा में अभी भी बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं।


बड़ा सवाल


जब जांच एजेंसियां लगातार कार्रवाई कर रही हैं, तब भी भ्रष्टाचार के मामले क्यों नहीं थम रहे? क्या कार्रवाई का डर खत्म हो गया है, या फिर व्यवस्था में ऐसे दोष हैं जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं? लोकायुक्त की यह रिपोर्ट सरकार और प्रशासन दोनों के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय बन गई है।


बौद्धिक प्रतिकार की टिप्पणी


भ्रष्टाचार के खिलाफ केवल छापेमारी पर्याप्त नहीं है। समयबद्ध जांच, शीघ्र अभियोजन, दोषियों को सजा और प्रशासनिक जवाबदेही ही ऐसी रिपोर्टों के आंकड़ों को कम कर सकती है। यदि उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों के खिलाफ लगातार गंभीर मामले सामने आते रहेंगे, तो जनता का शासन व्यवस्था पर विश्वास प्रभावित होना स्वाभाविक है।

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