तबादला आदेश के बाद भी इंदौर में एडीएम की मौजूदगी पर उठे सवाल, शासन से पारदर्शिता की मांग
प्रणव बजाज
मध्य प्रदेश शासन द्वारा राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के बड़े पैमाने पर तबादले किए जाने के बाद भी इंदौर प्रशासन का एक मामला लगातार चर्चा में है। अपर कलेक्टर रोशन राय के तबादले के बावजूद उनके कार्यमुक्त होने में हुई देरी और अंतिम समय में हुए बदलाव को लेकर प्रशासनिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कई समाचार माध्यमों ने भी इसे तबादला सूची का सबसे चर्चित मामला बताया है। रिपोर्टों के अनुसार, राज्य प्रशासनिक सेवा के 155 अधिकारियों के तबादले किए गए थे। इंदौर से कई संयुक्त कलेक्टर और एसडीएम स्तर के अधिकारियों का स्थानांतरण हुआ, जबकि अपर कलेक्टर रोशन राय को मैहर भेजा गया। साथ ही रिंकेश वैश्य को नियमित रूप से अपर कलेक्टर का दायित्व सौंपा गया।
प्रशासनिक हलकों में उठ रहे प्रमुख सवाल
यदि तबादला आदेश जारी हो चुका था, तो कार्यमुक्ति में देरी क्यों हुई?
क्या प्रशासनिक आवश्यकता के कारण ऐसा हुआ या अन्य कोई कारण था?
क्या शासन की ओर से इस संबंध में कोई विशेष निर्देश जारी किए गए थे?
क्या भविष्य में ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय की जाएगी?
इन सवालों पर अभी तक शासन की ओर से कोई विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। उपलब्ध रिपोर्टों में भी किसी राजनीतिक संरक्षण या अनुचित प्रभाव का पुष्ट प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है। इसलिए ऐसे आरोपों को तथ्य के रूप में नहीं कहा जा सकता
अधिकारियों की कमी भी बनी चुनौती- इंदौर प्रदेश की आर्थिक राजधानी होने के कारण यहां लगातार वीआईपी दौरे, निवेश कार्यक्रम और बड़े प्रशासनिक आयोजन होते रहते हैं। तबादलों के बाद अपर कलेक्टर स्तर पर अधिकारियों की संख्या कम होने और कुछ अधिकारियों के अवकाश पर रहने से प्रशासनिक जिम्मेदारियों का दबाव बढ़ने की बात भी सामने आई है।
संपादकीय टिप्पणी- लोकतांत्रिक व्यवस्था में केवल तबादला आदेश जारी होना पर्याप्त नहीं है। पारदर्शिता तभी मानी जाएगी जब आदेशों का समयबद्ध पालन हो और यदि किसी अधिकारी को प्रशासनिक कारणों से रोका जाता है, तो उसका कारण भी सार्वजनिक रिकॉर्ड में स्पष्ट हो। इससे अनावश्यक अटकलों और विवादों पर विराम लगाया जा सकता है।

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