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नोटों की खनक बनाम दिलों की धड़कन: क्या पैसे की चमक में खो रही है इंसानियत?

 

आज का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि इंसान ने पैसे को सिर्फ एक साधन नहीं, बल्कि अपना भगवान बना लिया है। रिश्तों की कीमत अब भावनाओं, त्याग और समर्पण से नहीं, बल्कि बैंक बैलेंस और संपत्तियों से तय होने लगी है। चंद रुपयों की खातिर बेटा पिता का सम्मान भूल रहा है, भाई भाई का विश्वास बेच रहा है और दोस्ती भी स्वार्थ के तराजू पर तौली जा रही है। ऐसा लगता है कि नोटों की खनक ने इंसानियत की अंदरूनी आवाज़ को पूरी तरह दबा दिया है।


*साधन जब उद्देश्य बन जाए तो पतन निश्चित है

पैसा जीवन की बुनियादी आवश्यकता है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन जब पैसा जीवन की जरूरत न रहकर जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन जाए, तो समाज का पतन तय है। आज लोग धन कमाने की अंधी दौड़ में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें अपने बुजुर्ग माता-पिता के आंसू, परिवार की खुशियां और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियां तक दिखाई नहीं देतीं। समाज में बढ़ता भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, रिश्वतखोरी और अपराध इसी असीम लालच की देन हैं। लोग कुछ लाख रुपये के लिए अपने ईमान, चरित्र और खून के रिश्तों तक का सौदा करने से नहीं हिचकते।

*आलीशान मकान, लेकिन दिलों में खालीपन*

इस आधुनिक युग की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि करोड़ों कमाने वाले भी आज मानसिक सुकून की तलाश में भटक रहे हैं। लोगों के पास आलीशान मकान हैं, महंगी गाड़ियां हैं और सुख-सुविधाओं के तमाम साधन हैं, लेकिन दिलों में वह पुराना अपनापन और शांति गायब है। जिस समाज में पैसे के लिए भाई भाई का दुश्मन बन जाए और बेटा अपने बूढ़े माता-पिता को बोझ समझने लगे, वहां भौतिक विकास तो हो सकता है, लेकिन नैतिक दिवालियापन भी उतनी ही तेजी से बढ़ता है।

*सोच बदलने का समयः तिजोरी नहीं, कर्म साथ जाएंगे*

अब समय आ गया है कि हम ठहरकर अपनी सोच बदलें। पैसा कमाना गलत नहीं है, खूब कमाइए, लेकिन उसे अपने विवेक का मालिक मत बनने दीजिए। धन से शानदार बेड खरीदा जा सकता है लेकिन नींद नहीं; धन से सुविधाएं खरीदी जा सकती हैं, लेकिन संस्कार, विश्वास, सम्मान और सच्चे रिश्ते कभी नहीं।

*याद रखिए:* अंत समय में हमारे साथ न तो कोई तिजोरी जाती है और न ही बैंक बैलेंस। हमारे साथ जाते हैं केवल हमारे अच्छे कर्म और लोगों के दिलों में छोड़ी गई हमारी पहचान। यदि हमें अपने समाज और आने वाली पीढ़ी को बचाना है, तो पैसे से पहले इंसानियत को महत्व देना होगा। यह शाश्वत सत्य है कि धन से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता, बल्कि रिश्तों से बड़ा कोई धन नहीं होता।

*- पत्रकार मुकेश सोलंकी भीनमाल(राज.)*

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