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भाजपा नेता निलेश चौधरी* पर 200 करोड़ की सीलिंग जमीन मामले में घिरे सवाल, फर्जी आदेश से कॉलोनी मंजूरी का आरोप

 

प्रणव बजाज

17 हेक्टेयर सीलिंग भूमि को निजी बताकर काट दिए प्लॉट, जांच में आदेश ही नहीं मिला; करोड़ों की बिक्री के बाद खुला बड़ा खेल

इंदौर जिले के हातोद क्षेत्र में सामने आया यह मामला सिर्फ एक कॉलोनी का नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था, राजस्व रिकॉर्ड और कॉलोनी अनुमतियों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। स्वास्तिक ग्रैंड नामक कॉलोनी के लिए जिस भूमि पर विकास अनुमति दी गई, वह जांच में सीलिंग की भूमि निकली। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जिस आदेश के आधार पर जमीन को सीलिंग मुक्त बताया गया था, जांच में वह आदेश रिकॉर्ड में मिला ही नहीं।


इस पूरे मामले में पूर्व पार्षद और भाजपा नेता निलेश चौधरी, उनके परिवार, बिल्डर शरद गुप्ता तथा मंजूरी प्रक्रिया से जुड़े कुछ अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। प्रशासन ने विकास अनुमति निरस्त कर दी है, लेकिन तब तक करोड़ों रुपये के प्लॉट बिक चुके थे।

17 हेक्टेयर जमीन पर कॉलोनी का प्रस्ताव

हातोद के सोनगीर गांव की करीब 17.422 हेक्टेयर भूमि पर कॉलोनी विकसित करने का प्रस्ताव रखा गया। यह जमीन बाबूलाल चौधरी, उनके पुत्र निलेश चौधरी, दिनेश चौधरी, सुनील चौधरी और परिवार के अन्य सदस्यों के नाम दर्ज थी। डेवलपर के रूप में शरद गुप्ता को आगे किया गया

कॉलोनी की मंजूरी के लिए वर्ष 2009-10 के एक कथित आदेश का हवाला दिया गया, जिसमें दावा किया गया कि यह भूमि सीलिंग से मुक्त हो चुकी है। इसी आधार पर कॉलोनी सेल और जिला प्रशासन ने 8 जनवरी 2025 को विकास अनुमति जारी कर दी।

दूसरे बिल्डर के आवेदन से खुला पूरा मामला

मामले का खुलासा तब हुआ जब बिल्डर नवीन मेहता ने पास की जमीन पर कॉलोनी विकसित करने के लिए आवेदन दिया। उनके प्रोजेक्ट में भी इसी तरह की सीलिंग भूमि शामिल थी।

मेहता ने जब अपने दस्तावेज जमा किए तो कॉलोनी सेल ने उनसे सीलिंग मुक्त होने का आदेश मांगा। उन्होंने वही आदेश क्रमांक बताया, जिसका उपयोग पहले स्वास्तिक ग्रैंड की मंजूरी में किया गया था। लेकिन जब उस आदेश की प्रति मांगी गई तो वह उपलब्ध नहीं हो सकी।

यहीं से पूरे मामले की दोबारा जांच शुरू हुई।

जांच में निकला सबसे बड़ा खुलासा

कलेक्टर शिवम वर्मा के निर्देश पर फाइल दोबारा खोली ग। एसडीएम स्तर पर जांच हुई तो पता चला कि जिस आदेश के आधार पर जमीन को सीलिंग मुक्त बताया गया था, राजस्व रिकॉर्ड में ऐसा कोई अंतिम आदेश मौजूद ही नहीं है।

रजिस्टर में केवल आदेश क्रमांक दर्ज मिला, लेकिन उससे संबंधित मूल आदेश नहीं मिला। जांच टीम ने पुराने अभिलेख, राजस्व बोर्ड और संबंधित कार्यालयों में भी दस्तावेज तलाशे, लेकिन कथित आदेश का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।

कलेक्टर ने रद्द कराई विकास अनुमति

बिल्डर पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया। सभी पुराने दस्तावेजों की जांच कराई गई, लेकिन कथित आदेश प्रस्तुत नहीं किया जा सका।

इसके बाद कलेक्टर शिवम वर्मा ने कॉलोनी की विकास अनुमति निरस्त करने के निर्देश दिए और अपर कलेक्टर रिंकेश वैद्य ने आधिकारिक रूप से अनुमति रद्द कर दी।

टी एंड सीपी के पूर्व अधिकारी का नाम भी सामने आया

जांच के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि मंजूरी प्रक्रिया में नगर एवं ग्राम निवेश (टी एंड सीपी) के एक सेवानिवृत्त सहायक संचालक दर्शन लाल गोयल का नाम भी चर्चा में है।

कंपनी के रिकॉर्ड के अनुसार उनकी पत्नी मनोरमा गोयल डेवलपर कंपनी में 36 प्रतिशत हिस्सेदार हैं। जबकि शरद गुप्ता और दीपक तेगे की 28-28 प्रतिशत तथा रौनक अग्रवाल की 8 प्रतिशत हिस्सेदारी बताई गई है

यही दस्तावेज मंजूरी फाइल में भी लगाए गए थे।

करोड़ों के प्लॉट बिकने के बाद संकट

स्वास्तिक ग्रैंड कॉलोनी में लगभग 271 प्लॉट विकसित किए गए। विकास अनुमति मिलने के बाद करोड़ों रुपये के प्लॉटों की बुकिंग और बिक्री हो चुकी है।

अब अनुमति रद्द होने के बाद सबसे बड़ा संकट उन खरीदारों पर आ गया है जिन्होंने अपनी जीवनभर की कमाई लगाकर प्लॉट खरीदे। कई खरीदारों को अभी तक पूरे विवाद की जानकारी भी नहीं है।

चार सौ बीसी और एफआईआर की मांग

पूरे मामले में आरोप लगाया जा रहा है कि सीलिंग भूमि को निजी भूमि बताने के लिए फर्जी आदेश का सहारा लिया गया।

मांग उठ रही है कि यदि जांच में आदेश फर्जी पाया जाता है तो पूर्व पार्षद निलेश चौधरी, उनके परिवार, डेवलपर शरद गुप्ता तथा पूरे प्रकरण से जुड़े जिम्मेदार लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी, कूटरचना और अन्य आपराधिक धाराओं में एफआईआर दर्ज की जाए।

कौन हैं निलेश चौधरी

निलेश चौधरी हातोद क्षेत्र के भाजपा नेता हैं और पूर्व पार्षद रह चुके हैं। उनकी पत्नी भी नगर परिषद में पार्षद रह चुकी हैं। वे क्षेत्रीय राजनीति में प्रभावशाली माने जाते हैं।

सबसे बड़ा सवाल

इस पूरे मामले ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं—

यदि आदेश अस्तित्व में ही नहीं था तो विकास अनुमति किस आधार पर दी गई?

कॉलोनी सेल और संबंधित विभागों ने दस्तावेजों का सत्यापन क्यों नहीं किया?

करोड़ों रुपये के प्लॉट बिकने तक प्रशासन को जानकारी क्यों नहीं हुई?

यदि आदेश फर्जी था तो उसके लिए जिम्मेदार कौन है?

प्लॉट खरीदने वाले लोगों के नुकसान की भरपाई कौन करेगा?

यह मामला केवल एक कॉलोनी तक सीमित नहीं है। यदि जांच निष्पक्ष और व्यापक हुई तो कॉलोनी अनुमतियों की पूरी प्रक्रिया, राजस्व रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही पर भी बड़े खुलासे हो सकते हैं।

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