उज्जैन। अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे और दान को लेकर उठे विवादों के बीच मध्य प्रदेश के विश्व प्रसिद्ध Mahakaleshwar Jyotirlinga Temple महाकाल मंदिर का पुराना गबन मामला भी एक बार फिर चर्चा में आ गया है। श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र इस मंदिर में चढ़ावे और दान राशि के प्रबंधन को लेकर पहले भी करोड़ों रुपये की अनियमितताओं के आरोप सामने आ चुके हैं।
महाकाल मंदिर देश के सबसे अधिक चढ़ावा प्राप्त करने वाले मंदिरों में शामिल है। वर्ष 2024 में मंदिर को नकद दान, सोना-चांदी और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं के रूप में 165 करोड़ रुपये से अधिक का चढ़ावा प्राप्त हुआ था।
इसी बीच वर्ष 2024 में मंदिर से जुड़े एक बड़े वित्तीय घोटाले का खुलासा हुआ था। रिपोर्टों के अनुसार, मंदिर के राजस्व और वित्तीय लेनदेन में तीन करोड़ रुपये से अधिक की कथित हेराफेरी सामने आई, जिसके बाद जांच एजेंसियां सक्रिय हुईं और दो आरोपियों की गिरफ्तारी भी की गई। मामले ने मंदिर प्रशासन की कार्यप्रणाली और वित्तीय निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।
महाकाल मंदिर में इससे पहले भी विभिन्न परियोजनाओं और व्यवस्थाओं को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। वर्ष 2023 में महाकाल लोक कॉरिडोर में स्थापित सप्तऋषि प्रतिमाओं के क्षतिग्रस्त होने के बाद लोकायुक्त ने भ्रष्टाचार और निर्माण गुणवत्ता को लेकर जांच शुरू की थी। विपक्ष ने उस समय परियोजना में अनियमितताओं के आरोप लगाए थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि देश के बड़े मंदिरों में हर वर्ष करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है, इसलिए पारदर्शी लेखा प्रणाली, नियमित ऑडिट और डिजिटल निगरानी व्यवस्था बेहद आवश्यक है। श्रद्धालुओं का विश्वास बनाए रखने के लिए मंदिर ट्रस्टों और प्रशासनिक संस्थाओं की जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
हाल के दिनों में राम मंदिर में चढ़ावे की गिनती और दान प्रबंधन को लेकर उठे विवादों ने देशभर में मंदिरों की वित्तीय पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी है। इसी संदर्भ में महाकाल मंदिर का पुराना गबन प्रकरण फिर चर्चा में है, जिसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आस्था से जुड़े बड़े संस्थानों में वित्तीय व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी एवं जवाबदेह बनाने की जरूरत है।

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