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कर्नाटक की सरकार में अंदर तक लगी है दीमक? डीके सरकार बनते ही विवादों की आंधी, आखिर वजह क्या है?Is the Karnataka government deeply infested with termites? The formation of the DK government has sparked a storm of controversy. What is the reason

 

कर्नाटक में नई सरकार के गठन के कुछ ही दिनों बाद कांग्रेस के भीतर खींचतान और असंतोष की खबरों ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। मुख्यमंत्री D. K. Shivakumar के नेतृत्व वाली नई सरकार को सत्ता संभालते ही कैबिनेट और विभागों के बंटवारे को लेकर पहली बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। 


सबसे बड़ा विवाद वरिष्ठ कांग्रेस नेता Ramalinga Reddy की नाराजगी को लेकर सामने आया। रिपोर्टों के अनुसार, विभागों के आवंटन से असंतुष्ट होकर उन्होंने इस्तीफे की पेशकश तक कर दी थी। हालांकि बाद में पार्टी नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद मामला शांत हो गया और उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया। 

आखिर विवाद की जड़ क्या है?

कांग्रेस लंबे समय से कर्नाटक में कई प्रभावशाली नेताओं के बीच संतुलन बनाकर चलती रही है। डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद सबसे बड़ी चुनौती मंत्रिमंडल और महत्वपूर्ण विभागों के बंटवारे को लेकर उभरी है। खासकर बेंगलुरु विकास जैसे प्रभावशाली विभाग को लेकर पार्टी के भीतर प्रतिस्पर्धा देखने को मिली। 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक मंत्री की नाराजगी का मामला नहीं, बल्कि सत्ता के नए समीकरणों का संकेत है। मुख्यमंत्री बनने के बाद डीके शिवकुमार को विभिन्न क्षेत्रीय, जातीय और राजनीतिक समूहों के बीच संतुलन साधना पड़ रहा है। 

विपक्ष को मिला हमला करने का मौका

भाजपा और जेडी(एस) ने कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान को सरकार की कमजोरी बताना शुरू कर दिया है। भाजपा नेताओं का आरोप है कि सरकार बनने के साथ ही सत्ता संघर्ष सामने आ गया है और इसका असर प्रशासनिक कामकाज पर पड़ सकता है। 

वहीं कांग्रेस नेतृत्व का कहना है कि मतभेद लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और सभी मुद्दों का समाधान पार्टी के भीतर कर लिया गया है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि विवाद सुलझ चुका है और सरकार पूरी मजबूती से काम करेगी। 

नई सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां

मंत्रिमंडल और विभागों के बंटवारे से पैदा असंतोष।

विभिन्न गुटों और वरिष्ठ नेताओं के बीच संतुलन बनाना।

विपक्ष के हमलों का जवाब देना।

बेंगलुरु के बुनियादी ढांचे और विकास संबंधी वादों को पूरा करना।

चुनावी वादों और प्रशासनिक अपेक्षाओं पर खरा उतरना। 

क्या सचमुच "दीमक" लग गई है?

फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह जरूर स्पष्ट है कि नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी पार्टी के भीतर संतुलन बनाए रखना है। सत्ता परिवर्तन के बाद उभरे शुरुआती विवाद इस बात का संकेत हैं कि कर्नाटक कांग्रेस में नेतृत्व और प्रभाव को लेकर कई परतों वाली राजनीति चल रही है। आने वाले महीनों में यह तय होगा कि डीके शिवकुमार इन चुनौतियों को अवसर में बदल पाते हैं या नहीं।

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