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रेलवे के कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी का बड़ा खुलासा: “ATM से निकाल लिया जाता है आधा वेतन”Railway contract employee makes a big revelation: “Half the salary is withdrawn through ATM”

 

बौद्धिक प्रतिकार | विशेष रिपोर्ट


देश की जीवनरेखा मानी जाने वाली भारतीय रेलवे में कार्यरत कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों ने ठेकेदारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कई कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें कागजों में पूरा वेतन दिखाया जाता है, लेकिन वास्तविकता में ठेकेदार विभिन्न तरीकों से उनकी मजदूरी का बड़ा हिस्सा वापस ले लेते हैं।


एक कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर दावा किया कि वेतन खाते में आने के बाद ठेकेदार या उसके प्रतिनिधि कर्मचारियों से एटीएम कार्ड और पिन की जानकारी मांगते हैं। आरोप है कि खाते में जमा राशि में से आधा या बड़ा हिस्सा निकाल लिया जाता है, जबकि रिकॉर्ड में पूरा भुगतान दर्शाया जाता है।

कर्मचारियों का कहना है कि नौकरी जाने के डर से अधिकांश लोग शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। ठेका प्रणाली में काम करने वाले सफाईकर्मी, ट्रैक मेंटेनेंस स्टाफ, लोडिंग-अनलोडिंग कर्मचारी और अन्य श्रमिक आर्थिक शोषण का सामना कर रहे हैं।

श्रम कानूनों के अनुसार किसी कर्मचारी के वेतन से अवैध कटौती करना दंडनीय अपराध है। यदि ऐसे आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल श्रम कानूनों का उल्लंघन नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और मजदूरों के अधिकारों के हनन का गंभीर मामला भी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि रेलवे प्रशासन, श्रम विभाग और संबंधित जांच एजेंसियों को इस मामले की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। वेतन भुगतान की डिजिटल निगरानी, कर्मचारियों की गोपनीय शिकायत व्यवस्था और ठेकेदारों के ऑडिट से ऐसी अनियमितताओं पर अंकुश लगाया जा सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कर्मचारियों के आरोप सही हैं, तो वर्षों से यह खेल किसकी निगरानी में चलता रहा? क्या जिम्मेदार अधिकारी इससे अनजान थे, या फिर व्यवस्था की खामियों का लाभ उठाकर मजदूरों के हक पर डाका डाला जाता रहा?

मजदूरों की मेहनत पर चलने वाली व्यवस्था में यदि मजदूर ही अपने हक के वेतन से वंचित रह जाएं, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि सामाजिक न्याय पर भी एक गंभीर प्रश्नचिह्न है।

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