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अब फिट बनेगा इंडिया .....!Now India will become fit.....!

         


                         • रवि उपाध्याय 


देश वासियों का यह सौभाग्य है कि सन् 2014 के बाद देश में पहली बार ऐसी सरकार आई है जो लोगों की सेहत को लेकर जितनी चिंतित है,ऐसी चिंता इसके पहले किसी सरकार ने रखी हो याद नहीं आता है। लोगों की सेहत को देखते हुए हमारी सरकार ने 15 मई को पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाने का जो शानदार फैसला किया है उसकी जितनी तारीफ की जाए वह कम है। विपक्षी नेता इसकी लाख आलोचना करें लेकिन यह निर्णय देश को फिट बनाने वाला साबित होगा। जब देश होगा फिट, तभी तो इंडिया बनेगा हिट । 


रही विपक्षी नेताओं की आलोचना की बात तो,वो बेचारे चुनाव के मारे, दुखियारे इतना भी न करें ? एक दूसरे को गालियां भी न दें ? आपस में एक दुसरे को गालियां दे कर वे लोग हमारी लोक भाषा का ही तो संरक्षण कर रहे हैं। यह कितनी बड़ी सेवा है। यदि विपक्ष के नेता भड़ास नहीं निकलेंगे तो वो सफ़ा ही पागल हो जाएंगे। तब वे अनाड़ी नंबर 1 के गोविंदा की तरह गाएंगे, मैं लैला-लैला (मिंस, कुर्सी कुर्सी) चिल्लाऊंगा कुर्ता फाड़ के, कुर्ता फ़ाड़के, सब छोड़ छाड़ के। अरे वो कुर्सी कुर्सी चिल्लाएंगे कुर्ता फ़ाड़के। नेता लोग अपना कुर्ता नहीं फाड़ते वो दूसरों के कुर्तों को ही फाड़ते हैं। जनता तो यही कहेगी नेता पागल हो गया है कुर्ता फ़ाड़के।


यदि आपको हमारी बात पर भरोसा न हो तो लिख कर ले लो। लिख कर इसलिए कि इन दिनों गारंटी लिख कर देने का चलन है। नेता लोग भी इन दिनों लिख कर गारंटी देने की बात इसलिए करने लगे हैं कि वह खुद जानते हैं कि जनता की नजर में उनकी क्रेडिबिलिटी या साख क्या है। मतदाताओं को अब नेताओं की जुबान पर भरोसा नहीं बचा है। तभी तो नेता गण चुनावी मंचों पर अब गारंटी देने की बात करने लगे। एक पार्टी तो अपनी गारंटियों पर एफिडेविट तक दे चुकी है। पर पार्टी के एफिडेविट पर भी जनता ने भरोसा नहीं किया। परिणामस्वरूप लुटिया डूब गई। वैसे यह माना जाता है कि जिस चीज पर गारंटी दी जाती है ।उस की गुणवत्ता पर वस्तु के निर्माता को भी संशय होता है। बताओ क्या आदमी की कोई गारंटी है ? नहीं न । तो भैया जैसे आदमी की कोई गारंटी नहीं होती वैसे ही नेताओं की जुबान की भी कोई गारंटी नहीं होती । 


याद है दिल्ली का एक टोपी बाज नेता था। ऐसा लगता था मानो हरिशचंद्र की का पुनर्जन्म हो गया हो। भाया वही डुप्लीकेट टोपी और मफ़लर धारी। खांसी पुरुष दिल्ली ही नहीं पूरे देश को टोपी पहनाने के बाद राजा रणजीत सिंह की भूमि पर जा पहुंचा। जैसे कथाकार सुदर्शन की कालजयी रचना 'हार की जीत' में डाकू खड़क सिंह ने बाबा भारती से उनका प्रिय घोड़ा सुल्ताना ठगा था, वैसे ही यह टोपीधारी मान के लोहे को घोड़ों को हड़पने का खेल करता रहता है। 


वैसे सियासत में टोपी लगाने का काम आजादी के पहले से चला आ रहा है। आज़ादी की लड़ाई में टोपी की इज्जत थी। दिलचस्प तो यह है कि जिस व्यक्ति (गांधी)के नाम से टोपी लोकप्रिय हुई खुद उस व्यक्ति ने कभी यह टोपी नहीं लगाई। यह टोपी बाज गैंग अन्ना की टोपी ले कर ऐसे भागे कि आज तक अन्ना रालेगांव सिद्धि में अपने घर पर अपना सिर खुजा रहे हैं। अब तो सर जी के सिर पर न वो टोपी है और न ही वो मफलर ही नज़र आता है। यह कहा जाता है कि आदमी में थोड़ी चालाकी और चमड़ी मोटी हो तो वो कभी भूखा नहीं रह (मर)सकता। यही हाल दिल्लीवाल सर जी एंड कंपनी का है। इस पर एक फिल्मी गाना याद आता है - तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर (वोटर ) जाग जरा। लगता है मुसाफिर हिप्नोटिज्म का शिकार गहरी नींद में सो रहा है। 


देश का मानना है कि पेट्रोलियम पदार्थों के भाव बढ़ा कर सरकार ने शानदार काम किया है। इससे उपभोक्ता की सेहत तो सुधरेगी ही सरकार की सेहत भी स्ट्रांग होगी। सरकार की सेहत इस दृष्टि मजबूत होगी कि सरकार के खजाने पर घाटे का बोझ भी कम होगा।वहीं जनता की सेहत इसलिए टना टन होगी कि वह अब थोड़ी बहुत दूर जाने के लिए स्कूटी छोड़ कर पैदल चलने को प्रेरित होगी । इस तरह पैदल चलने से देशवासी फिट होंगे। इससे देश को सेहतमंद बनाने में भी मदद मिलेगी। इससे फिट बनेगा इंडिया तभी तो हिट बनेगा इंडिया।


याद दिला दें कि अच्छी सेहत के लिए डॉक्टर्स, वैद्य, हकीम सभी पैदल चलने की सलाह देते हैं। पेट्रोल डीजल की कीमतें बढ़ाने पर विपक्षी नेता फालतू हयातौबा मचा रहे हैं। भाई साहब मोदी जी तो डॉक्टर्स, हकीम और वैद्यों की सलाह को ही इंप्लीमेंट कर रहे हैं। हमारे ऋग्वेद के एक ग्रंथ में सेहत और विकास का मूल मंत्र दिया गया है,चरैवेति चरैवेति। कृपया इसका अर्थ चरते रहो - चरते रहो न लगाएं। ( बिहार में सोशल इंजीनियरिंग के पुरोधाओं ने इसका यही मतलब लगा लिया था। ) इसका सही अर्थ है चलते रहो, चलते रहो। सरकार आप से यही करवा रही है। लोगों को पैदल चलने के लिए प्रेरित कर रही है। पैदल चलना सबसे बेहतर व्यायाम माना जाता है। इसीलिए देख लेना सरकार हम सब को सड़कों पर नंगे पैर चला कर ही नहीं दौड़ा कर ही मानेगी।


हमें भरोसा है कि सरकार एक दिन पूरे देश को सड़कों पर लाने और उन्हें पैदल चलाने को मजबूर कर के ही दम लेगी। जनता ऐसा चाहे राजी खुशी करे या जोरा जोरी यह हो कर रहेगा। (ऐसा दूध से धुले विपक्ष का दावा है।) विपक्ष तो वैसे भी सड़कों पर आ ही गया है। बची थीं दीदी तो भी इन दिनों सड़कों पर आ गई हैं। यह सब मिलकर इस कोशिश में हैं कि जनता भी सड़कों पर आ जाए । इसी प्रयास में बॉडी बिल्डर सिक्स पैक धारी विपक्ष के नेता दुनिया भर में चक्कर लगा लगा डॉक्टरों से मोदी रूपी सियासी महामारी से मुक्ति की दवा पूछ रहे हैं। ये बॉडी बिल्डर नेता ने खुद भले ही सिक्स पैक बना लिए हों पर उनकी पार्टी जर्जरावस्था में है। इनका मानना है कि राम ही करेंगे बेड़ा पार। अपने को क्या?


जिस रोज से मोदी जी देश के प्रथम सेवक बने हैं तभी से वे देश के युवाओं और बूढ़े-सयानों की सेहत को लेकर फिक्र मंद हैं। तभी तो उन्होंने युवाओं से बुजुर्गों और बाई बहनों से कहा कि वह नियमित रूप से योग किया करें। खाद्य तेल के इस्तेमाल में कमी करें क्योंकि इसे विदेशों से आयात करने में विदेशी मुद्रा भंडार सिकुड़ने लगा है। वह चाहते हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार मल्लिकार्जुन की तरह मुटाता रहे और आदमी सिकुड़ता जाए।

माना कि मोदी जी बड़े दूर दृष्टि वाले नेता हैं। लेकिन जनता को ऐसा तो रहने दो कि वह दूर से भी नज़र आती रहे। उसे देख कर बापू की लाठी का भ्रम तो न हो।


एक बात आज तक यह समझ में नहीं आई की बापू को ये लाठी किसने पकड़ाई थी। वो तो अहिंसा के पुजारी थे। बापू जब कहीं आते जाते थे तो उनको सहारा देने के लिए आजू बाजू महिलाएं हुआ करतीं थीं। फिर यक्ष प्रश्न वही है कि उन्हें लठिया किसने और क्यों पकड़ाई थी। वो तो बकरी पालक थे तो फिर वही सवाल की वे लठिया का क्या करते थे। देश का कोई भी गांधी वादी मेरी इस जिज्ञासा, की बापू को लठिया किसने दी थी, को अहिंसक तरह से समझा सके तो बड़ी मेहरबानी होगी। वैसे अब लठिया कहां है यह भी देश पूछना चाहता है। यह रहस्य जानना इसलिए भी जरूरी है कि विपक्ष के एक बड़के नेता ने एक बार सरे आम और सरे राह कहा था कि यह जो नरेंद्र मोदी है न इसको जनता लाठियों से पीटेगी। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि क्या बापू की लाठी विपक्ष के इन्हीं नेता के पास ही है। कहीं ये लठिया वह लोग तो नहीं ले गए जो नेकर पहना करते थे।


राजनीतिक पंडित कहते हैं कि जहां अन्य नेताओं की सोच समाप्त होती है वहीं से मोटा भाई की सोच शुरू होती है। उन्हें रेत में से भी तेल निकालने की महारत हासिल है। वैसे लगता है कि तेल निकालने की यह कला उन्हें पूर्वजों से हस्तांतरित हुई होगी। भैया ये गुजरात की धरती का ही कमाल है कि यहां जो भी नेता जन्म लेता है इतिहास ही लिख देता है। गांधी जी, सरदार पटेल, नरेंद्र मोदी और अमित शाह इसके जीवंत उदाहरण हैं। 


तेल निकालने की पुश्तैनी इसी कला का असर है कि महंगाई के चलते जनता का तेल निकला जा रहा है । इससे लोगों की फालतू चर्बी पिघल रही है। रोम जल रहा है और नीरो बांसुरी बजा रहा है। यह चमत्कार भी देखिए कि करोड़ों रुपए के मालिक विपक्ष के नेता महंगाई को लेकर अपना सिर पीट रहे हैं, लेकिन मजाल है कि जनता के भाल पर जरा सी भी शिकन आई हो। जनता इसके बाद भी खुश है कि चलो पेट्रोल डीजल के भाव में तीन रुपए लीटर की ही वृद्धि हुई। यदि पांच रुपए भी बढ़ जाते क्या कर लेते।अब कौन से चुनाव होने हैं। 


यह देखा गया है कि हमारे देश के प्रथम सेवक उनके पूर्ववर्तियों से एक दम अलग हैं। मेन ऑफ डिफरेंट। प्रथम सेवक ने जनता से अपील की है कि जहां तक हो सके वे एक साल तक सोना नहीं खरीदें। जबकि उनके पूर्ववर्ती प्रथम प्रधानमंत्री हों, शास्त्री जी हों, या लौह महिला हों सबने देशवासियों से सोना दान करने की अपील की थी। ये अकेला व्यक्ति है जो केवल एक साल तक सोना नहीं खरीदने की सलाह दे रहा है। पूर्ववर्तियों की तरह स्वर्ण दान की मांग नहीं कर रहा है।


मंगल गीत गाओ कि वो तो सरकार ने पेट्रोल डीजल के भाव में तीन रुपए लीटर ही बढ़ाए हैं चार नहीं । वैसे भी तीन को तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा कहा जाता है। तो भाइयों केवल तीन रुपए बढ़ाने का राज़ यह है कि देश में भाजपा का परचम दक्षिण के राज्यों को छोड़कर तीनों दिशाओं पूरब, पश्चिम और उत्तर दिशा में फहरा रहा है। यदि भाजपा दक्षिण के राज्य तमिलनाडु, केरलम के विधानसभा चुनावों में जीत गई होती तो पेट्रोल और डीजल के दाम में वृद्धि तीन रुपए की नहीं चार रुपए की होती। इस तरह दक्षिण के राज्यों ने देश की जनता को एक रुपए लीटर का फायदा करवाया है।


( लेखक व्यंग्यकार एवं एक राजनैतिक समीक्षक भी हैं। )

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