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मातृ फाउंडेशन इंदौर द्वारा दायर इंदौर देवास बाईपास रोड की जनहित याचिका पर हाई कोर्ट सख्त — सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश व हाईकोर्ट के पूर्व आदेश के पालन के निर्देशHigh Court takes strict action on the public interest litigation filed by Matri Foundation Indore regarding Indore Dewas Bypass Road – Instructions to comply with the landmark Supreme Court order and the previous High Court order




इंदौर।मध्य प्रदेश हाई कोर्ट, इंदौर खंडपीठ ने आज दिनांक 12.05.2026 को मातृ फाउंडेशन द्वारा इंदौर-देवास बायपास की दयनीय एवं खतरनाक स्थिति को लेकर दायर जनहित याचिका W.P. No. 20448/2021 में महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिनांक 13.04.2026 को पारित ऐतिहासिक आदेश तथा हाई कोर्ट द्वारा पूर्व में दिनांक 22.08.2023 को दिए गए आदेश का पालन करने के निर्देश दिए हैं।


उक्त जनहित याचिका मातृ फाउंडेशन की ओर से एडवोकेट अमेय बजाज द्वारा दायर की गई थी, जिसमें इंदौर-देवास बायपास की अत्यंत खराब स्थिति, गड्ढों, टूटे पुल-पुलिया, चोक ड्रेनेज, पानी भराव, बंद स्ट्रीट लाइट, अनियंत्रित झाड़ियों, दुर्घटना संभावित क्षेत्रों, सर्विस रोड की तबाही तथा जनता से भारी टोल वसूली के बावजूद मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध न कराने का मुद्दा उठाया गया था।

आज सुनवाई के दौरान एडवोकेट अमेय बजाज द्वारा माननीय न्यायालय के समक्ष यह तर्क रखा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने 13 अप्रैल 2026 को In Re: Phalodi Accident (Suo Motu W.P. (Civil) No. 9/2025) में राष्ट्रीय राजमार्गों की खतरनाक स्थिति को सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 अर्थात “जीवन के अधिकार” का उल्लंघन माना है तथा पूरे देश में NHAI, MoRTH एवं राज्य प्रशासन को राष्ट्रीय राजमार्गों की सुरक्षा, ब्लैकस्पॉट, स्ट्रीट लाइट, ट्रक ले-बाय, इमरजेंसी मेडिकल रिस्पॉन्स, रोड सर्विलांस, अवैध पार्किंग, ड्रेनेज, ATMS सिस्टम एवं रोड सेफ्टी इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर बाध्यकारी निर्देश जारी किए हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि राष्ट्रीय राजमार्ग देश की कुल सड़कों का लगभग 2% हिस्सा हैं, परंतु लगभग 30% सड़क दुर्घटनाएं इन्हीं पर होती हैं तथा “एक भी व्यक्ति की रोकी जा सकने वाली दुर्घटना में मृत्यु, राज्य की संवैधानिक विफलता है।”


माननीय सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि —

“मानव जीवन की पवित्रता के सामने कोई आर्थिक या प्रशासनिक बाध्यता महत्वपूर्ण नहीं हो सकती।”


माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश के पैरा 4 में राष्ट्रीय राजमार्गों की सुरक्षा एवं प्रबंधन को लेकर देशव्यापी अंतरिम दिशानिर्देश जारी करते हुए कहा कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर किसी भी प्रकार की अवैध पार्किंग, अनधिकृत ढाबे, व्यावसायिक अतिक्रमण एवं unsafe stopping को तत्काल प्रभाव से नियंत्रित किया जाए। न्यायालय ने NHAI, MoRTH, राज्य पुलिस, जिला प्रशासन एवं PWD को संयुक्त रूप से dedicated inspection teams, highway surveillance system, ATMS technology, CCTV monitoring, GPS tracking एवं e-challan व्यवस्था लागू करने के निर्देश दिए। सुप्रीम Court ने accident blackspots की पहचान कर वहां high intensity lighting, warning signboards, speed enforcement cameras एवं road safety infrastructure स्थापित करने, truck lay-bye एवं wayside amenities विकसित करने, emergency ambulance एवं recovery crane तैनात करने, drainage एवं encroachment removal सुनिश्चित करने तथा प्रत्येक जिले में District Highway Safety Task Force गठित करने के आदेश दिए। न्यायालय ने यह भी निर्देशित किया कि highway safety zones में बिना NHAI clearance के कोई licence या commercial approval जारी नहीं किया जाएगा तथा सभी संबंधित एजेंसियां compliance report निर्धारित समय सीमा में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करेंगी।


एडवोकेट अमेय बजाज ने हाई कोर्ट को यह भी बताया कि वर्ष 2023 में स्वयं NHAI ने हाई कोर्ट के समक्ष यह आश्वासन दिया था कि इंदौर-देवास बायपास के सभी गड्ढे, अनलेवल रोड, चोक ड्रेनेज, पुलिया एवं टूटे पुल तीन माह के भीतर ठीक कर दिए जाएंगे। उक्त आश्वासन को हाई कोर्ट ने अपने आदेश दिनांक 22.08.2023 में रिकॉर्ड पर लिया था।


इसके बावजूद वर्ष 2026 तक बायपास की वास्तविक स्थिति में व्यापक सुधार नहीं हुआ है तथा आज भी:


* बड़े-बड़े गड्ढे,

* टूटी सर्विस रोड,

* खुले ड्रेनेज,

* जलभराव,

* खराब स्ट्रीट लाइट,

* दुर्घटना संभावित ब्लैकस्पॉट,

* अव्यवस्थित ट्रैफिक,

* तथा जानलेवा सड़क परिस्थितियां मौजूद हैं।


मातृ फाउंडेशन द्वारा हाल ही में दाखिल अंतरिम आवेदन में यह भी मांग की गई थी कि जब तक सड़कें सुरक्षित एवं मानकों के अनुरूप नहीं हो जातीं, तब तक जनता से टोल टैक्स वसूली रोकी जाए, क्योंकि कानून के अनुसार टोल “quid pro quo” अर्थात सुविधा के बदले लिया जाने वाला शुल्क है। यदि जनता को सुरक्षित एवं सुगम सड़क उपलब्ध नहीं कराई जा रही, तो टोल वसूली न्यायसंगत नहीं कही जा सकती।


उक्त आवेदन में सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय NHAI vs O.J. Janeesh, DSC-Viacon Ventures Pvt. Ltd. vs Lal Manohar Pandey तथा जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के निर्णय Sugandha Sawhney vs Union of India का भी उल्लेख किया गया, जिनमें न्यायालयों ने स्पष्ट कहा है कि खराब एवं असुरक्षित राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल वसूली नागरिकों के साथ अन्याय है।


आज पारित आदेश में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने NHAI को निर्देशित किया है कि वह सुप्रीम कोर्ट के 13.04.2026 के आदेश तथा हाई कोर्ट के पूर्व आदेश दिनांक 22.08.2023 का पालन करे। NHAI द्वारा जवाब प्रस्तुत करने हेतु समय मांगा गया, जिस पर न्यायालय ने प्रकरण को जून 2026 में सूचीबद्ध किया है। 


एडवोकेट अमेय बजाज ने कहा कि यह मामला अब केवल “सड़क मरम्मत” का नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे तौर पर “जनता की सुरक्षा, संवैधानिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय राजमार्गों पर नागरिकों के जीवन के अधिकार” का विषय बन चुका है। उन्होंने कहा कि यदि जनता से करोड़ों रुपये का टोल टैक्स वसूला जा रहा है, तो जनता को सुरक्षित, प्रकाशयुक्त, व्यवस्थित एवं मानकों के अनुरूप राष्ट्रीय राजमार्ग उपलब्ध कराना NHAI एवं संबंधित एजेंसियों की कानूनी और संवैधानिक जिम्मेदारी है।

 इस जनहित याचिका को अंतिम निष्कर्ष तक लेकर जाएँगे ताकि इंदौर-देवास बायपास पर यात्रा करने वाले लाखों नागरिकों को सुरक्षित एवं मानकयुक्त सड़क सुविधा प्राप्त हो सके।


अगली सुनवाई में टोल टैक्स की वसूली ना की जाये इस बात पर विचार होगा ।

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