नई दिल्ली ।बौद्धिक प्रतिकार
टाटा मोटर्स समेत कई बड़ी companies ने इस बार मुनाफे में गिरावट के बावजूद अपने निवेशकों को डिविडेंड देने का ऐलान किया है। ऐसे में आम निवेशकों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब कंपनी की कमाई कम हो रही है या कई बार नुकसान भी हो रहा है, तो आखिर डिविडेंड बांटा कैसे जाता है?
दरअसल, डिविडेंड केवल मौजूदा तिमाही या साल के मुनाफे पर निर्भर नहीं करता। कंपनियों के पास पहले से जमा मजबूत ‘कैश रिजर्व’ और बचा हुआ अधिशेष (Retained Earnings) होता है, जिसका इस्तेमाल निवेशकों को लाभांश देने में किया जाता है। यही वजह है कि कमजोर नतीजों के बावजूद कई कंपनियां अपने शेयरधारकों को निराश नहीं करतीं।
विशेषज्ञों के अनुसार, बड़ी और स्थापित कंपनियां लंबे समय तक लगातार कमाई से अच्छा रिजर्व तैयार कर लेती हैं। जब किसी एक साल या तिमाही में मुनाफा घटता है, तब भी वे अपने रिजर्व फंड के सहारे डिविडेंड जारी रख सकती हैं। इससे निवेशकों का भरोसा बना रहता है और कंपनी की बाजार में सकारात्मक छवि भी कायम रहती है।
डिविडेंड को कंपनियां निवेशकों के प्रति भरोसे और स्थिरता का संकेत भी मानती हैं। यदि कंपनी के पास पर्याप्त नकदी मौजूद है और भविष्य की योजनाओं पर ज्यादा दबाव नहीं है, तो वह कम मुनाफे के बावजूद डिविडेंड देने का फैसला कर सकती है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि लगातार घटते मुनाफे के बावजूद लंबे समय तक डिविडेंड देना हर कंपनी के लिए संभव नहीं होता। यदि कैश फ्लो कमजोर होने लगे और रिजर्व कम हो जाएं, तो कंपनियों को भविष्य में डिविडेंड घटाना या बंद करना पड़ सकता है।
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि निवेशकों को केवल डिविडेंड देखकर निवेश का फैसला नहीं करना चाहिए, बल्कि कंपनी की वित्तीय स्थिति, कर्ज, कैश फ्लो और भविष्य की विकास योजनाओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
Post a Comment