Top News

चालाक ड्राफ्टिंग से कानून को नहीं छिपा सकते! सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा संदेशClever drafting can't hide the law! The Supreme Court sends a powerful message



सुप्रीम कोर्ट ने सिविल मामलों में दाखिल होने वाले वाद-पत्रों (Plaint) को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालतों को plaint को केवल सतही तौर पर नहीं, बल्कि बेहद ध्यान और गंभीरता से पढ़ना चाहिए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं कानूनी रोक को चालाक ड्राफ्टिंग के जरिए छिपाने की कोशिश तो नहीं की गई है। 


शीर्ष अदालत ने कहा कि कई मामलों में पक्षकार कानूनन प्रतिबंधित दावों को अलग भाषा और तकनीकी ड्राफ्टिंग के जरिए पेश करने की कोशिश करते हैं, ताकि मामला शुरुआती स्तर पर खारिज न हो। ऐसे मामलों में अदालत का दायित्व है कि वह पूरे plaint को “meaningfully” यानी सार्थक तरीके से पढ़े।


कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल कुछ लाइनों या पैराग्राफ को देखकर फैसला नहीं लिया जा सकता। पूरे वाद-पत्र, उसके तथ्यों और मांगों को एक साथ समझना जरूरी है। अगर पहली नजर में यह साफ हो जाए कि मामला किसी कानूनी प्रावधान से प्रतिबंधित है, तो अदालत Order VII Rule 11 CPC के तहत plaint खारिज कर सकती है। 


सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि अदालतें इस स्तर पर सबूतों या विवाद के गुण-दोष में नहीं जाएंगी, बल्कि केवल plaint में लिखी बातों के आधार पर तय करेंगी कि मामला सुनवाई योग्य है या नहीं। 


कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी फर्जी, तकनीकी और “clever drafting” वाले मुकदमों पर बड़ा संदेश है। इससे निचली अदालतों को भी यह संकेत मिला है कि केवल शब्दों की बाजीगरी के आधार पर कानून की रोक को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

Post a Comment

Previous Post Next Post