भारतीय रुपये में लगातार कमजोरी देखने को मिल रही है। डॉलर के मुकाबले रुपया गिरकर 95.63 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे आयात महंगा होने और महंगाई बढ़ने की चिंता तेज हो गई है।
विशेषज्ञों के मुताबिक वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर की बढ़ती मांग और अन्य प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले उसकी मजबूती इसका बड़ा कारण है। इसके अलावा भारतीय शेयर बाजार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI/FII) की लगातार बिकवाली और पूंजी निकासी ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी भारतीय मुद्रा के लिए चुनौती बना हुआ है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपया कमजोर पड़ता है।
रुपये में गिरावट का असर आम लोगों पर भी पड़ सकता है। इलेक्ट्रॉनिक सामान, पेट्रोल-डीजल, विदेश से आने वाले उत्पाद और कई आयातित वस्तुएं महंगी हो सकती हैं। वहीं विदेश में पढ़ाई और यात्रा का खर्च भी बढ़ने की संभावना है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आने वाले समय में वैश्विक बाजार, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों के रुख पर रुपये की चाल काफी हद तक निर्भर करेगी।

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