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पावरफुल को राहत, आमजन बेहालRelief for the Powerful, Distress for the Common Man

 

सीएस बनते ही पूर्व IAS वीरा राणा के पति की जमीन वन भूमि से हटी, MP में 60 साल पुराना विवाद गहराया

भोपाल/सीहोर। मध्यप्रदेश में जमीनी विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है, जहां प्रभावशाली लोगों को त्वरित राहत मिलने और आम नागरिकों के वर्षों तक भटकने के आरोप सामने आए हैं। ताजा मामला पूर्व मुख्य सचिव वीरा राणा से जुड़ा है, जिनके कार्यकाल के दौरान उनके आईपीएस पति संजय की जमीन को वन भूमि की श्रेणी से हटा दिया गया।


जानकारी के अनुसार, सीहोर जिले के इच्छावर क्षेत्र में खसरा नंबर 122/13 और 122/7 की जमीन, जो पहले वन भूमि के रूप में दर्ज थी, उसे फरवरी 2025 में वन विभाग ने दखल से बाहर कर दिया। यह कार्रवाई उस समय हुई जब वीरा राणा राज्य की मुख्य सचिव थीं। इससे पहले वर्ष 2022 में वन विभाग ने इन जमीनों पर नोटिस जारी कर व्यावसायिक उपयोग पर रोक लगाई थी।

प्रदेशभर में गहराता विवाद

मध्यप्रदेश में निजी और वन भूमि के बीच सीमा विवाद कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह समस्या करीब छह दशक पुरानी है। वर्तमान में 10 हजार से अधिक निजी भूमि से जुड़े प्रकरण लंबित हैं, जबकि हजारों मामले राजस्व और वन विभाग के बीच सीमा निर्धारण को लेकर अटके हुए हैं।

करीब 50 हजार हेक्टेयर भूमि ऐसी है, जिस पर आम नागरिक निजी स्वामित्व का दावा करते हैं, लेकिन वन विभाग उसे अपनी जमीन मानता है। गुना, शिवपुरी, छिंदवाड़ा, सागर, शहडोल, पन्ना और सिवनी जैसे जिलों में यह समस्या व्यापक रूप से देखी जा रही है।

विधानसभा तक गूंजा मामला

यह मुद्दा विधानसभा में भी उठ चुका है। वन मंत्री दिलीप अहिरवार ने सदन में स्वीकार किया कि कई निजी जमीनें वन विभाग के अधीन दर्ज हैं। सिर्फ शहडोल वन वृत्त में ही 4200 हेक्टेयर से अधिक निजी भूमि विभाग के नियंत्रण में है।

अफसरों ने जताई चिंता

मुख्य सचिव स्तर की बैठकों में भी इस मुद्दे पर चिंता जताई जा चुकी है। बैठक में एसीएस दीपाली रस्तोगी, संजय कुमार शुक्ला और प्रमुख सचिव राघवेंद्र कुमार सिंह ने लंबित मामलों और सीमा विवादों के समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया।

आमजन और प्रदेश दोनों को नुकसान

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तरह के विवादों के चलते लोग अपनी जमीन का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं। वहीं हजारों मामले कोर्ट में लंबित होने से शासन की छवि पर भी असर पड़ रहा है और संसाधनों का अतिरिक्त बोझ बढ़ रहा है।

यह पूरा मामला एक बार फिर सवाल खड़ा करता है—क्या सिस्टम में समानता है, या फिर प्रभावशाली लोगों के लिए नियम अलग तरीके से लागू होते हैं?

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