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जिन्ना की पहली डील से मुनीर की मजबूरी तक: क्या बार-बार सौदे की मेज़ पर बैठा पाकिस्तान?From Jinnah's first deal to Munir's compulsion: Did Pakistan sit at the bargaining table again and again?

सम्पादकीय



इतिहास को नारों में समेटना आसान है, समझना मुश्किल। “अमेरिका के हाथों नीलाम” जैसे वाक्य गुस्सा तो जगाते हैं, पर सच्चाई कहीं ज्यादा जटिल है। पाकिस्तान की विदेश नीति की कहानी दरअसल सुरक्षा-चिंता, संसाधनों की कमी और सत्ता-समীকরণ की त्रिकोणीय मजबूरी की कहानी है—जहाँ हर मोड़ पर वाशिंगटन के साथ लेन-देन हुआ, लेकिन हर बार उसकी कीमत भी चुकानी पड़ी।

जिन्ना के बाद की राह: विकल्प कम, जोखिम ज्यादा

आजादी के तुरंत बाद पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ा सवाल था—सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता। सीमित औद्योगिक आधार और कश्मीर विवाद ने उसे जल्दी ही बाहरी सहारे की ओर धकेला। यही वह जमीन थी, जहाँ से सैन्य-सहायता बनाम रणनीतिक प्रतिबद्धता का सिलसिला शुरू हुआ।

शीतयुद्ध का सौदा: SEATO–CENTO और ‘फ्रंटलाइन स्टेट’

1950–60 के दशक में पाकिस्तान ने पश्चिमी सैन्य गठबंधनों का हिस्सा बनकर अमेरिकी मदद हासिल की। बदले में उसने खुद को सोवियत-विरोधी ढांचे में बाँध लिया। हथियार और डॉलर आए, पर रणनीतिक स्वायत्तता धीरे-धीरे गिरवी पड़ती गई। 1965 और 1971 के युद्धों में यह निर्भरता खुलकर सामने आई—मदद शर्तों के साथ आती है, और संकट के वक्त सीमित भी रह जाती है।

अफगान जंग: डॉलर, जिहाद और उसके साये

1979 के बाद सोवियत-अफगान युद्ध ने पाकिस्तान को फिर ‘जरूरी’ बना दिया। अरबों डॉलर की सहायता, हथियार और प्रशिक्षण—सब कुछ आया। लेकिन इसके साथ आया कट्टरपंथ, हथियारों का प्रसार और आंतरिक अस्थिरता। जो नीति बाहर के मोर्चे के लिए थी, उसके दुष्प्रभाव घर के भीतर पनपे।

9/11 के बाद: ‘वॉर ऑन टेरर’ और दोहरी कीमत

2001 के बाद पाकिस्तान एक बार फिर अमेरिका का अहम साझेदार बना। आर्थिक पैकेज और सैन्य सहयोग बढ़ा, पर ड्रोन हमले, संप्रभुता पर बहस और घरेलू हिंसा ने इसकी कीमत तय की। वाशिंगटन के साथ नज़दीकी ने राहत दी, पर भरोसे का संकट भी साथ-साथ चला।

आज का दौर: मुनीर की मजबूरी या प्रणाली की विरासत?

जनरल असीम मुनीर के दौर में पाकिस्तान गंभीर आर्थिक दबाव, कर्ज़ और क्षेत्रीय चुनौतियों से जूझ रहा है। IMF की शर्तें, खाड़ी देशों की मदद, और अमेरिका से संतुलित रिश्ते—यह सब चॉइस नहीं, कम्पल्शन जैसा दिखता है। सवाल यह नहीं कि “कितनी बार नीलाम हुआ”, बल्कि यह है कि हर बार सौदे की शर्तें किसने तय कीं और क्यों।

तिखा सच

पाकिस्तान ने कई मौकों पर मदद के बदले रणनीतिक रियायतें दीं—यह तथ्य है। लेकिन हर बार इसे सिर्फ “नीलामी” कहना आधी कहानी है। असल तस्वीर यह है कि कमजोर अर्थव्यवस्था + सुरक्षा भय + सैन्य-प्रधान नीति ने उसे बार-बार बाहरी सहारों की ओर धकेला।

और जब नीति का कम्पास भीतर से डगमगाता हो, तो बाहर का हाथ दिशा भी देता है—और कीमत भी तय करता है।

नारों से परे देखिए—यह कहानी किसी एक देश की चालाकी भर नहीं, बल्कि एक राज्य की लगातार बनी रही निर्भरता की है। जब तक आंतरिक सुधार, आर्थिक आत्मनिर्भरता और नागरिक-प्रधान नीति मजबूत नहीं होती, तब तक हर दौर में “डील” बदलती रहेगी—और उसकी कीमत भी।

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