Top News

बर्फबारी की जगह आग की चपेट में पहाड़, उत्तराखंड से कश्मीर तक धधक रहे जंगल; टूटा दशकों पुराना रिकार्डInstead of snowfall, mountains are engulfed in flames; forests are burning from Uttarakhand to Kashmir; a decades-old record has been broken.

 

दशकों से हिमालयी राज्यों- उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के जंगलों में आग गर्मियों के मौसम में लगती थी, लेकिन पिछले कुछ सालों से यह चक्र टूट रहा है। इस सर्दी में पहले उत्तराखंड के जंगलों में और अब हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में भी इतनी तेजी से आग लग रही है कि ज्ञानिकों और वन अधिकारियों का कहना है कि यह अब कोई असामान्य घटना नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के कारण बदलते पारिस्थितिक पैटर्न का एक खतरनाक संकेत है।


फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) के आकड़ों के अनुसार, सर्दियों का मौसम शुरू होने के बाद 1 नवंबर से अब तक उत्तराखंड में देश में सबसे अधिक 1,756 'फायर अलर्ट' दर्ज किए गए हैं। यह आकड़ें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे उन राज्यों को पीछे छोड़ रही है, जो पारंपरिक रूप से आग के प्रति संवेदनशील माने जाते हैं।

देश भर में जंगल की आग के बदलते पैटर्न को समझने के लिए पांच साल के अध्ययन में शामिल देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक अमित कुमार वर्मा ने बताया, 'जंगल की आग एक प्राकृतिक चक्र का हिस्सा है, लेकिन जलवायु परिवर्तनशीलता उस चक्र को संकुचित और तीव्र कर रही है।'

हिमाचल के जंगलों में भी आग का तांडव

उत्तराखंड की तरह, हिमाचल प्रदेश में भी पिछले साल अक्टूबर के पहले सप्ताह से बारिश नहीं हुई है। कुल्लू, मंडी, शिमला और चंबा जैसे प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों में हिमपात लगभग न के बराबर हुआ है। इसके चलते राज्य भर के जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ गई हैं। राज्य वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, शिमला वन क्षेत्र में सबसे अधिक (62), उसके बाद रामपुर (16), मंडी (8), ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क-कुल्लू (6), चंबा और कुल्लू (4-4), और बिलासपुर और वन्यजीव (दक्षिण) क्षेत्र (2-2) में आग लगी है।

जंगल में आग लगने के प्रमुख कारण

जंगल में लगने वाली इस आग का सबसे बड़ा कारण अत्यधिक शुष्कता है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में अक्टूबर के बाद से नाममात्र की बारिश हुई है। वहीं, कश्मीर घाटी में भी इस बार 40% कम बर्फबारी दर्ज की गई है। मट्टी में नमी नहीं होने की वजह से जंगल में बिखरी पत्तियां और सुखी घास 'बारूद' की तरह काम कर रही हैं। यहां एक छोटी सी चिंगारी भी विकराल रूप ले लेती है। अधिकारियों ने मुख्य कारण अत्यधिक सूखे को बताया है।

विशेषज्ञों की मानें तो जंगल में लगने वाले इस आग के पीछे सिर्फ प्रकृति ही नहीं, मानवीय गतिविधियां भी शामिल हैं। ऊंचाई वाले इलाकों में शिकारी कस्तूरी मृग जैसे जानवरों को घेरने के लिए जानबूझकर जंगलों में आग लगा रहे हैं। यह आग भी विकराल रूप धारण कर ले रही है।

अधिकारियों के अनुसार, इसके पीछे जंगल के किनारे स्थित खेतों में पराली जलाना, जैव-द्रव्यमान और ठोस अपशिष्ट जलाना और कुछ मामलों में ग्रामीणों द्वारा मवेशियों के लिए नई घास उगाने के लिए जंगल की जमीन में आग लगाना जैसे कारण हो सकते हैं।

सर्दियों में लगने वाले आग के परिणाम घातक सिद्ध हो रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर वन प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन पर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया, तो इससे हिमालय का पारिस्थित तंत्र स्थायी रूप से नष्ट हो सकता है।

Post a Comment

Previous Post Next Post