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शताब्दी के मोड़ पर संघ : संगठनात्मक परिवर्तन और मध्यप्रदेश की भूमिकाThe RSS at the turn of the century: Organizational changes and the role of Madhya Pradesh

 


अजय कुमार बियानी

इंजीनियर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष केवल उत्सव या स्मरण का अवसर नहीं है, बल्कि आत्ममंथन और संगठनात्मक पुनर्रचना का भी एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। सौ वर्षों की यात्रा के बाद संघ आज जिस विस्तार और सामाजिक उपस्थिति के स्तर पर खड़ा है, वहाँ संगठनात्मक संरचना को समयानुकूल बनाना एक स्वाभाविक आवश्यकता बन जाती है। इसी संदर्भ में संघ द्वारा प्रस्तावित संगठनात्मक बदलावों को देखा जाना चाहिए।


संघ की कार्यशैली का मूल स्वभाव यह रहा है कि वह तात्कालिकता में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक दृष्टि से निर्णय करता है। चाहे कार्यपद्धति में परिवर्तन हो, वेश-भूषा में संशोधन हो या संगठनात्मक ढांचे में सुधार—हर निर्णय के पीछे वर्षों का विचार-विमर्श और ज़मीनी अनुभव रहा है। शताब्दी वर्ष में सामने आए संगठनात्मक परिवर्तन भी इसी निरंतर चिंतन की परिणति प्रतीत होते हैं।

प्रस्तावित बदलावों में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन प्रांत प्रचारक व्यवस्था से जुड़ा है। संघ का अनुभव यह बताता है कि जैसे-जैसे कार्यक्षेत्र का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे बड़े प्रांतों में समन्वय और निगरानी की चुनौती भी बढ़ी। इसी कारण अब संभाग प्रचारक और राज्य प्रचारक जैसी नई व्यवस्था की परिकल्पना की गई है। इसका उद्देश्य संगठन को अधिक विकेंद्रीकृत, प्रभावी और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना है।


मध्यप्रदेश के संदर्भ में यह परिवर्तन विशेष महत्व रखता है। मध्यप्रदेश भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता के कारण भी एक बड़ा और संवेदनशील राज्य है। जनजातीय क्षेत्रों से लेकर शहरी विस्तार तक, यहाँ संघ के कार्य की प्रकृति अलग-अलग रूपों में सामने आती है। ऐसे में छोटे कार्यक्षेत्र वाले संभाग प्रचारक स्थानीय परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं और स्वयंसेवकों के साथ अधिक सजीव संवाद स्थापित कर सकते हैं।

राज्य प्रचारक की भूमिका मध्यप्रदेश जैसे राज्य में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। वे पूरे राज्य में संघ के कार्यों का समन्वय करते हुए यह सुनिश्चित करेंगे कि अलग-अलग संभागों में कार्य की दिशा और विचारधारा में संतुलन बना रहे। इससे संगठनात्मक निर्णय अधिक सुव्यवस्थित और उत्तरदायी बन सकते हैं।

उत्तर प्रदेश के उदाहरण की तरह ही, मध्यप्रदेश में भी प्रशासनिक इकाइयों के अनुरूप संगठनात्मक इकाइयों को संतुलित करने का प्रयास किया जा रहा है। यह संकेत देता है कि संघ अब केवल आंतरिक सुविधा नहीं, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक संवाद को भी ध्यान में रखकर अपनी संरचना को ढाल रहा है। इससे संघ और समाज के बीच की दूरी कम होने की संभावना बनती है।

क्षेत्र प्रचारक व्यवस्था में प्रस्तावित परिवर्तन को भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। क्षेत्र प्रचारकों की संख्या में कमी को संगठनात्मक संकुचन के रूप में नहीं, बल्कि स्पष्ट भूमिका-विभाजन और बेहतर समन्वय के रूप में समझना अधिक उपयुक्त होगा। मध्यप्रदेश जैसे राज्य, जो बड़े क्षेत्रीय समूह का हिस्सा हैं, वहाँ यह व्यवस्था यह सुनिश्चित कर सकती है कि नीति-निर्धारण और ज़मीनी कार्य के बीच संतुलन बना रहे।

संघ की बैठकों की संरचना में प्रस्तावित बदलाव भी इसी सोच का विस्तार हैं। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा जैसी सर्वोच्च बैठक का हर वर्ष न होकर तीन वर्ष में होना, यह दर्शाता है कि संघ अब नीति-निर्माण को अधिक स्थायित्व और दीर्घकालिक प्रभाव के साथ देखना चाहता है। वहीं अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की वार्षिक बैठक जारी रहना यह सुनिश्चित करता है कि संगठन की गतिविधियों की नियमित समीक्षा और मार्गदर्शन होता रहे।

यह भी उल्लेखनीय है कि इन सभी परिवर्तनों पर पिछले पाँच से छह वर्षों से मंथन चल रहा था। यह तथ्य स्वयं इस बात का प्रमाण है कि संघ परिवर्तन को अचानक लागू करने के बजाय क्रमिक और सुविचारित प्रक्रिया के रूप में अपनाता है। संभवतः मार्च 2026 की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में इन प्रस्तावों पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा और वर्ष 2027 से ये बदलाव ज़मीनी स्तर पर दिखाई देंगे।

मध्यप्रदेश के संदर्भ में यह देखना विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगा कि नई संरचना के तहत जनजातीय, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में संघ का कार्य किस प्रकार और अधिक प्रभावी बनता है। यदि संभाग स्तर पर निर्णय और संवाद मजबूत होते हैं, तो सेवा, संस्कार और सामाजिक समरसता से जुड़े कार्यक्रमों को नई गति मिल सकती है।

अंततः, संघ का यह शताब्दी परिवर्तन यह संकेत देता है कि वह स्वयं को स्थिर संस्था नहीं, बल्कि एक जीवंत और विकसित होते सामाजिक संगठन के रूप में देखता है। अतीत की विरासत को सहेजते हुए भविष्य की चुनौतियों के लिए स्वयं को तैयार करना—यही संघ की संगठनात्मक संस्कृति रही है। मध्यप्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में यदि यह परिवर्तन संतुलित और संवेदनशील ढंग से लागू होते हैं, तो यह संघ के आगामी सौ वर्षों की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

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