भारत में कर्ज लेने का तरीका पिछले एक दशक में तेजी से बदला है। पहले जहां लोन का इस्तेमाल मुख्य रूप से घर, वाहन या कारोबार जैसी बड़ी जरूरतों के लिए किया जाता था, वहीं अब मोबाइल फोन, फ्रिज, टीवी और अन्य उपभोक्ता सामान खरीदने के लिए भी लोग आसानी से कर्ज ले रहे हैं। आसान EMI और डिजिटल लोन ने कर्ज तक पहुंच को पहले के मुकाबले काफी सरल बना दिया है।
कर्ज बाजार में NBFC यानी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की भूमिका भी बढ़ी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, खुदरा कर्ज में NBFCs की हिस्सेदारी बीते एक दशक में करीब 24 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इससे छोटे और मध्यम आकार के लोन की उपलब्धता बढ़ी है, लेकिन इसके साथ कर्ज चुकाने की क्षमता को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं।
पहली बार कर्ज लेने वाले ग्राहकों की संख्या बढ़ने का एक कारण डिजिटल प्लेटफॉर्म और तुरंत मिलने वाली EMI सुविधा है। कुछ मामलों में ग्राहक बिना पर्याप्त वित्तीय योजना बनाए छोटी-छोटी खरीद को भी किस्तों में बदल देते हैं। कई EMI एक साथ चलने पर मासिक आय का बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने में जाने लगता है।
हालांकि EMI अपने आप में समस्या नहीं है। असली चुनौती तब पैदा होती है जब व्यक्ति अपनी आय और मौजूदा देनदारियों को देखे बिना लगातार नया कर्ज लेता है। विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी लोन से पहले ब्याज, प्रोसेसिंग फीस, कुल भुगतान और मासिक किस्त को समझना जरूरी है।
बदलते कर्ज बाजार ने उपभोक्ताओं को सुविधा जरूर दी है, लेकिन सुविधा और जरूरत के बीच फर्क समझना अब पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।

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