प्रणव बजाज
भोपाल। मध्यप्रदेश की सबसे चर्चित महिला कल्याण योजनाओं में शामिल लाड़ली बहना योजना को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का एक बयान अब चर्चा में है। रविवार, 4 अक्टूबर को भोपाल के रवींद्र भवन में आयोजित बुंदेली समागम में छतरपुर की कंटेंट क्रिएटर बिन्नू रानी के सवाल पर मुख्यमंत्री ने मजाकिया अंदाज में कहा—“तुमको मालूम नहीं, लाड़ली बहना ही बहुत महंगी पड़ गई। मुझे क्या पता था मुख्यमंत्री बनते ही इतनी भारी मार पड़ती है।” कार्यक्रम में मौजूद लोग इस टिप्पणी पर हंस पड़े।
बिन्नू रानी ने मुख्यमंत्री से पूछा था कि उन्होंने अपनी ‘जिज्जियों’ यानी बहनों के लिए तो बहुत कुछ किया, अब उनकी ‘बिन्नुओं’ यानी बेटियों के लिए क्या करना चाहते हैं। जवाब में मुख्यमंत्री ने योजना की आर्थिक जिम्मेदारी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि शुरुआत में लाड़ली बहना के तहत 1,000 रुपए प्रतिमाह दिए जाते थे और अब पात्र महिलाओं को 1,500 रुपए प्रतिमाह दिए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार को अपनी बहनों के लिए कोई परेशानी नहीं है।
लेकिन मुख्यमंत्री के इसी मजाकिया वाक्य ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—यदि योजना इतनी बड़ी आर्थिक जिम्मेदारी है, तो राज्य के खजाने पर इसका वास्तविक वार्षिक बोझ कितना है और सरकार इसकी भरपाई किस तरह कर रही है? योजना की शुरुआत 2023 में हुई थी और शुरुआती चरण में करीब 1.25 करोड़ महिलाएं पात्र थीं। पहली किस्त में ही सरकार ने 1,143 करोड़ रुपए से अधिक जारी किए थे।
यानी यह सिर्फ राजनीतिक मंच का मजाक नहीं, बल्कि हजारों करोड़ रुपए के सरकारी खर्च से जुड़ी योजना है। महिलाओं के खाते में पैसा पहुंचना एक पक्ष है, लेकिन दूसरे पक्ष में राजकोषीय दबाव, योजना की दीर्घकालिक वित्तीय क्षमता और सरकार की प्राथमिकताएं भी सार्वजनिक बहस का विषय होना चाहिए।
दिलचस्प यह भी है कि मुख्यमंत्री ने इसी कार्यक्रम में बुंदेलखंड की समस्याओं पर सवाल पूछे जाने पर कहा कि वहां की समस्या 24 घंटे में तो भगवान भी हल नहीं कर सकते। उन्होंने रोजगार, सिंचाई और पलायन की समस्या का जिक्र करते हुए केन-बेतवा परियोजना को महत्वपूर्ण बताया।
लाड़ली बहना ने मध्यप्रदेश की राजनीति और महिला कल्याण की बहस को जरूर बदल दिया है। लेकिन अब असली सवाल यह है—सरकार महिलाओं को आर्थिक सहायता देते हुए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय अर्थव्यवस्था को कितना मजबूत कर रही है?
क्योंकि चुनावी घोषणा से आगे किसी भी बड़ी कल्याणकारी योजना की असली परीक्षा यही है कि आज खाते में पैसा पहुंचे और कल महिला अपनी आर्थिक मजबूती के लिए सरकार पर निर्भर न रहे।

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