संपादकीय | प्रणव बजाज
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव का नतीजा आया और राजनीतिक गलियारों में ढोल बजने लगे। एबीवीपी ने केंद्रीय पैनल की चार में से तीन सीटें जीतीं—अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव। बस फिर क्या था, नतीजे को सीधे “पूरे देश के युवा” का प्रमाणपत्र घोषित करने की कवायद शुरू हो गई। मानो डूसू का बैलेट बॉक्स दिल्ली विश्वविद्यालय से निकलकर सीधे पूरे भारत की जनता के घर पहुंच गया हो!
जीत को जीत की तरह स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं। लेकिन छात्रसंघ चुनाव को राष्ट्रीय जनमत संग्रह बनाने की जल्दबाजी पर सवाल जरूर बनता है। डूसू के छात्र डूसू के लिए वोट करते हैं; उनका फैसला महत्वपूर्ण है, मगर उसे करोड़ों युवाओं की एकसमान राजनीतिक सोच का प्रमाण बताना अलग दावा है।
व्यंग्य देखिए—एक तरफ कहा जाता है कि युवा सोशल मीडिया के नैरेटिव में नहीं फंसता, दूसरी तरफ चुनाव परिणाम आते ही उसी परिणाम से अपनी पसंद का राष्ट्रीय नैरेटिव गढ़ दिया जाता है। यानी नैरेटिव गलत हो तो “प्रोपेगेंडा”, और अपने पक्ष में हो तो “ऐतिहासिक जनादेश”! राजनीति की यह सुविधा बड़ी कमाल की है।
एबीवीपी की जीत से इतना जरूर स्पष्ट है कि डूसू के इस चुनाव में उसके उम्मीदवारों को पर्याप्त समर्थन मिला और विपक्षी छात्र संगठनों को मतदाताओं को अपनी ओर खींचने में कठिनाई हुई। अब असली सवाल यह होना चाहिए कि छात्रों ने किन मुद्दों पर वोट दिया—फीस, छात्रावास, रोजगार, कैंपस सुविधाएं, सुरक्षा, शिक्षा, संगठनात्मक कामकाज या राष्ट्रीय राजनीति?
लेकिन राजनीतिक बयानबाजी को इन सवालों से क्या लेना-देना! वहां तो एक चुनाव का परिणाम आया नहीं कि “युवा शक्ति ने राष्ट्रवाद पर मुहर लगा दी” का प्रमाणपत्र छप गया।
और कांग्रेस-वामपंथी संगठनों के लिए भी यह नतीजा आत्ममंथन का विषय है। अगर वे कैंपस में प्रभाव चाहते हैं तो केवल भाजपा-विरोधी भाषणों से काम नहीं चलेगा। छात्रों के स्थानीय सवालों पर संगठन, नेतृत्व और ठोस कार्यक्रम भी दिखाने होंगे। डूसू की राजनीति में मतदाता आखिर छात्र है—किसी पार्टी का स्थायी वोटबैंक नहीं।
इसीलिए इस चुनाव का सबसे दिलचस्प व्यंग्य शायद यही है कि एक तरफ सभी दल युवाओं को समझाने का दावा करते हैं, दूसरी तरफ युवा अपने वोट से हर चुनाव में उन्हें समझाने की कोशिश करता है कि पहले उसकी समस्याएं सुनो।
डूसू का परिणाम एबीवीपी के लिए निश्चित रूप से राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन लोकतंत्र में जीत का सबसे बड़ा सम्मान यही है कि उसे जितना है उतना ही माना जाए—न उससे छोटा, न उससे बड़ा।
कैंपस के मतपत्र से निकली आवाज को सुनिए। उसे पूरे देश की आवाज घोषित करने की जरूरत नहीं है। क्योंकि लोकतंत्र में नैरेटिव बनाने वालों से ज्यादा ताकत उस छात्र के एक वोट में होती है, जो चुपचाप आता है, बटन दबाता है और चला जाता है।

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