हिंदू धार्मिक परंपरा में परिवर्तिनी एकादशी को भगवान विष्णु के शयनकाल से जुड़ा विशेष दिन माना जाता है। मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में जाते हैं। इसी अवधि को चातुर्मास कहा जाता है।
भाद्रपद शुक्ल एकादशी, यानी परिवर्तिनी एकादशी, पर भगवान विष्णु अपनी शेषशय्या पर करवट बदलते हैं। इसी वजह से इस एकादशी का नाम परिवर्तिनी पड़ा—अर्थात परिवर्तन या करवट लेने वाली।
इसका धार्मिक अर्थ केवल शारीरिक करवट लेना नहीं है। पुराणों और वैष्णव परंपरा में इसे सृष्टि के एक चरण से दूसरे चरण में प्रवेश का प्रतीक माना गया है। भगवान विष्णु के शयनकाल में संसार की गतिविधियां एक विशेष आध्यात्मिक अनुशासन से जुड़ी मानी जाती हैं और करवट बदलना इस अवधि के मध्य चरण का संकेत है।
एक प्रसिद्ध मान्यता यह भी है कि इस दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा का विशेष महत्व है। इसलिए इसे वामन द्वादशी से जुड़ी परंपराओं के साथ भी देखा जाता है।
एक रोचक धार्मिक मान्यता
कई वैष्णव परंपराओं में कहा जाता है कि भगवान विष्णु के करवट बदलने से देवताओं और प्रकृति की गतिविधियों में परिवर्तन का संकेत मिलता है। इसी कारण इस एकादशी पर व्रत, भगवान विष्णु की पूजा, तुलसी अर्पण और विष्णु सहस्रनाम के पाठ को विशेष फलदायी माना गया है।
यानी ‘भगवान करवट क्यों लेते हैं?’ का धार्मिक उत्तर है—चातुर्मास के मध्य चरण में परिवर्तन का प्रतीक, जबकि वैज्ञानिक अर्थ में इसे वास्तविक घटना नहीं, बल्कि धार्मिक प्रतीक और आस्था की परंपरा समझना चाहिए।

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