विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज
इंदौर। नवरात्रि के गरबे में दूसरे समुदायों की एंट्री को लेकर होने वाले विवादों के बीच इंदौर में अब एक नया धार्मिक-सामाजिक सवाल खड़ा हो गया है। जैन समाज के एक प्रस्तावित गरबा आयोजन के निरस्त होने को मुनि पुंगव श्री सुधासागर महाराज के उस संदेश से जोड़कर देखा जा रहा है, जिसमें उन्होंने जैन महिलाओं और बेटियों के सार्वजनिक रूप से गरबा करने पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि जैन नारी घर की देहरी, भगवान या गुरु के सामने ही नृत्य कर सकती है; सार्वजनिक स्थान पर नृत्य को उन्होंने जैन संस्कृति के विपरीत बताया।
यहीं से बहस का दूसरा पक्ष सामने आता है—यदि गरबा जैन संस्कृति के अनुरूप नहीं है तो क्या यह नियम केवल महिलाओं के लिए है? पुरुषों की भागीदारी पर समान रोक क्यों नहीं? सामाजिक संगठनों से जुड़े कुछ लोगों ने इसी सवाल को उठाते हुए कहा है कि गरबा को केवल ‘नाच’ मानना उचित नहीं, क्योंकि अनेक स्थानों पर इसे देवी आराधना और सांस्कृतिक परंपरा के रूप में किया जाता है।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जैन समाज में गरबा के आयोजन का दूसरा उदाहरण मौजूद है। 13 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट में भिंड में दशलक्षण पर्व के दौरान जैन गरबा-डांडिया महोत्सव आयोजित किए जाने की जानकारी दी गई। मार्च 2026 में उदयपुर में महावीर जन्म कल्याणक के अवसर पर जैन समाज की महिलाओं ने जैन गरबा-डांडिया में भाग लिया था।
इंदौर में 2023 में भी जैन सोशल ग्रुप द्वारा महिलाओं और पुरुषों की भागीदारी वाला गरबा आयोजित किए जाने का रिकॉर्ड मिलता है। ऐसे में सवाल केवल एक आयोजन रद्द होने का नहीं, बल्कि यह है कि जैन समाज में गरबा को लेकर धार्मिक मर्यादा की कोई सर्वमान्य व्याख्या है या अलग-अलग संतों और संगठनों की अलग दृष्टि?
विरोध करने वालों ने यह सवाल भी उठाया है कि यदि सार्वजनिक नृत्य जैन महिलाओं के लिए अनुचित है तो विवाह समारोहों, निजी पार्टियों और अन्य सामाजिक आयोजनों में महिला-पुरुषों के नृत्य को लेकर समान धार्मिक कसौटी क्यों नहीं तय होती। वहीं समर्थकों का तर्क है कि संत का संदेश जैन समाज के अनुयायियों के लिए धार्मिक आचरण का विषय है, इसे दूसरे समुदायों की आस्था या अधिकार से जोड़ना उचित नहीं।
इस पूरे विवाद में सबसे संवेदनशील सवाल यही है—धर्म की मर्यादा तय करने का अधिकार समाज स्वयं तय करेगा या किसी एक धार्मिक मत को सामुदायिक नियम मान लिया जाएगा? गरबा के बहाने अब बहस जैन समाज की सांस्कृतिक पहचान, महिलाओं की स्वतंत्रता और धार्मिक अनुशासन तक पहुंच गई है।

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