भागीरथपुरा रिपोर्ट में खुला अफसरों का हिसाब

तीन IAS को क्लीन चिट, संजीव श्रीवास्तव पर गंभीर जिम्मेदारी; 859 दिन की देरी पर सवाल



इंदौर | बौद्धिक प्रतिकार

भागीरथपुरा दूषित पानी कांड की न्यायिक जांच रिपोर्ट के 112 पन्ने सामने आने के बाद प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक तत्कालीन निगमायुक्त और वर्तमान इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा, तत्कालीन निगमायुक्त दिलीप यादव और तत्कालीन निगमायुक्त प्रतिभा पाल को पानी की लाइन के काम में देरी के लिए जिम्मेदार नहीं माना गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इनके कार्यकाल में प्रशासनिक स्तर पर काम में देरी नहीं हुई।


इसी तरह तत्कालीन एडिशनल कमिश्नर अभिलाष मिश्रा, सिद्धार्थ जैन और अभिषेक गेहलोत को भी रिपोर्ट में क्लीन चिट दी गई है। दूसरी ओर तत्कालीन एडिशनल कमिश्नर रोहित सिसोनिया और भव्या मित्तल के कार्यकाल में टेंडर प्रक्रिया में देरी का उल्लेख किया गया है। हालांकि रिपोर्ट के अनुसार फाइल तैयार करने और तकनीकी प्रक्रिया में लापरवाही मुख्य रूप से इंजीनियरिंग और तकनीकी अमले से जुड़ी थी।


सबसे गंभीर टिप्पणी जल शाखा के कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव को लेकर है। रिपोर्ट के मुताबिक वे 2013 से जल शाखा में पदस्थ थे और टेंडर, वर्क ऑर्डर, पाइपलाइन तथा मॉनिटरिंग से जुड़े कामों में उनकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी। जांच में इन प्रक्रियाओं में देरी और निगरानी में लापरवाही के लिए उनकी भूमिका को गंभीर माना गया है।


रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि 2019 में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट से पानी दूषित होने की जानकारी सामने आई थी। इसके बावजूद स्थायी समाधान में लंबा समय लगा। 2022 में शुरू हुई पाइपलाइन परियोजना में टेंडर से लेकर काम पूरा होने तक कुल 859 दिन की देरी का उल्लेख है। अब सवाल यही है—इतनी लंबी देरी के बाद जवाबदेही केवल फाइलों में तय होगी या कार्रवाई भी होगी?

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