इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ किया है कि शादी के सात साल के भीतर किसी महिला की मौत होने पर सिर्फ पोस्टमार्टम में हार्ट अटैक या मायोकार्डियल इन्फार्कशन दर्ज होना दहेज हत्या की एफआईआर या आपराधिक कार्यवाही खत्म करने का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने यह टिप्पणी फिरोजाबाद की निर्मला देवी की याचिका खारिज करते हुए की।
मामला 18/19 फरवरी 2025 की रात का है। महिला ससुराल में बेहोश मिली थी और 25 फरवरी को आगरा के अस्पताल में उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम में मौत का कारण मायोकार्डियल इन्फार्कशन से शॉक बताया गया। सास की ओर से तर्क दिया गया कि मौत स्वाभाविक थी, इसलिए दहेज हत्या की धाराएं लागू नहीं हो सकतीं।
लेकिन कोर्ट ने कहा कि “सामान्य परिस्थितियों से इतर मौत” का अर्थ केवल शरीर पर चोट, जलने या जहर मिलने तक सीमित नहीं है। यदि विवाह के शुरुआती वर्षों में महिला को लगातार दहेज के लिए प्रताड़ित किए जाने के आरोप हैं, तो यह जांच का विषय रहेगा कि मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना ने उसकी स्थिति को प्रभावित किया या नहीं।
इस मामले में शिकायतकर्ता ने दहेज और आर्थिक लेनदेन के आरोप भी लगाए थे। कोर्ट ने माना कि मौत पूरी तरह प्राकृतिक थी या कथित प्रताड़ना से जुड़ी परिस्थितियों का परिणाम, इसका फैसला गवाहों, चिकित्सकीय साक्ष्यों और ट्रायल के दौरान ही हो सकता है। हाईकोर्ट इस चरण पर “मिनी ट्रायल” नहीं कर सकता।
यानी हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि हार्ट अटैक से हुई हर मौत दहेज हत्या है। फैसला इतना है कि मेडिकल रिपोर्ट में हार्ट अटैक लिखा होना अकेले आधार पर दहेज हत्या की कार्यवाही खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

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