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आस्था के नाम पर शोर का कारोबार, राजनीति कब तक आंखें बंद रखेगी?

 

प्रणव बजाज

धर्म आस्था है, उत्सव है, समाज को जोड़ने की शक्ति है। लेकिन जब यही उत्सव डीजे के शोर, सड़कों पर कब्जे, देर रात तक ध्वनि प्रदूषण और प्रशासनिक नियमों की अनदेखी में बदल जाए तो सवाल उठाना धर्म-विरोध नहीं, नागरिक जिम्मेदारी है।



सबसे बड़ा सवाल उन राजनीतिक दलों से है जो हर धार्मिक आयोजन को वोट की नजर से देखने लगते हैं। मंच पर नेताओं की मौजूदगी, आयोजकों के साथ तस्वीरें और भीड़ के बीच राजनीतिक प्रदर्शन—इन सबके बीच क्या किसी नेता ने कभी यह पूछा कि अस्पताल में भर्ती मरीज रातभर कैसे सोएगा? परीक्षा की तैयारी कर रहा छात्र कैसे पढ़ेगा? बुजुर्ग, छोटे बच्चे और बीमार लोग इस शोर को कैसे सहेंगे?


विडंबना देखिए—जब नियम लागू करने की बारी आती है तो प्रशासन अक्सर राजनीतिक दबाव और सामाजिक विरोध के बीच उलझता दिखाई देता है। नियम किताब में मौजूद रहते हैं, लेकिन सड़कों पर उनका पालन कराने की इच्छाशक्ति गायब हो जाती है। यही दोहरा रवैया अराजकता को बढ़ावा देता है।


नागरिकों, डॉक्टरों और छात्रों की आवाज ने अब इस बहस को घर-घर पहुंचाया है। कहीं गणेशोत्सव को डीजे-मुक्त करने की पहल हुई है तो सवाल स्वाभाविक है—अगर बिना डीजे के आस्था अधूरी है, तो आस्था इतनी कमजोर कैसे हो गई?


सरकारों को यह तय करना होगा कि धार्मिक आयोजनों के नाम पर नियमों से समझौता होगा या कानून सबके लिए बराबर रहेगा। धर्म किसी एक राजनीतिक दल की जागीर नहीं और सड़क किसी आयोजक की निजी संपत्ति नहीं।


देशभर में धार्मिक उत्सव हों—पूरे उत्साह से हों। लेकिन लाउडस्पीकर की आवाज इतनी ऊंची न हो कि नागरिक अधिकारों की आवाज दब जाए।


राजनीति को भी तय करना होगा—उसे वोट चाहिए या नागरिकों का भरोसा?

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