संपादकीय | प्रणव बजाज
साक्षरता किसी भी समाज की प्रगति की पहली सीढ़ी है। पढ़ना-लिखना सीख जाना केवल अक्षरों को पहचान लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को अपने अधिकार समझने, सही निर्णय लेने और समाज में सम्मान के साथ आगे बढ़ने का अवसर देता है। सरकारें योजनाएं बना सकती हैं, स्कूल खोल सकती हैं और अभियान चला सकती हैं, लेकिन समाज की भागीदारी के बिना साक्षरता का लक्ष्य पूरी तरह हासिल करना आसान नहीं होगा।
यह मानना होगा कि निरक्षरता केवल सरकारी व्यवस्था की समस्या नहीं है। हमारे आसपास आज भी ऐसे लोग हैं जो उम्र, आर्थिक परिस्थितियों या पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण पढ़ाई से दूर रह गए। इनमें घरेलू कामगार, मजदूर, बुजुर्ग और कई ग्रामीण परिवार शामिल हैं। यदि समाज का शिक्षित वर्ग ऐसे लोगों को पढ़ाने में थोड़ा समय दे, तो बदलाव की शुरुआत घर और मोहल्ले से हो सकती है।
सरकार की जिम्मेदारी है कि स्कूलों की गुणवत्ता सुधरे, शिक्षक पर्याप्त संख्या में हों, बच्चों की पढ़ाई न छूटे और वयस्क शिक्षा के कार्यक्रम प्रभावी तरीके से चलें। लेकिन नागरिकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। किसी बच्चे को स्कूल पहुंचाना, किसी बुजुर्ग को हस्ताक्षर करना सिखाना या किसी जरूरतमंद को सरकारी योजना का फॉर्म समझा देना भी साक्षरता अभियान का हिस्सा है।
साक्षर समाज केवल सरकार से नहीं बनता, सरकार और समाज की साझी जिम्मेदारी से बनता है। इसलिए सवाल यह नहीं कि सरकार ने कितना किया, बल्कि यह भी होना चाहिए कि हमने अपने आसपास किसी एक व्यक्ति को पढ़ने-लिखने में सक्षम बनाने के लिए क्या किया?
यही छोटी पहल बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकती है।

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