वीरेंद्र हीरालाल पथरिया
राधाष्टमी केवल राधा जी के जन्म का उत्सव नहीं है, बल्कि यह प्रेम के उस स्वरूप को समझने का अवसर है, जिसमें पाने से अधिक महत्व समर्पण का है। संसार में हम जिसे प्रेम कहते हैं, उसमें अक्सर कोई न कोई अपेक्षा छिपी रहती है, साथ मिले, अपनापन मिले, बदले में प्रेम मिले। लेकिन राधा का प्रेम इन अपेक्षाओं से बहुत ऊपर है। वहां प्रेम किसी को अपना बनाने का प्रयास नहीं, बल्कि स्वयं को प्रियतम में पूरी तरह समर्पित कर देने की साधना है।
इसीलिए राधा को केवल कृष्ण की प्रेयसी के रूप में देखना उनके आध्यात्मिक स्वरूप को सीमित कर देना होगा। राधा उस प्रेम की प्रतीक हैं, जिसमें प्रेमी का अपना अस्तित्व धीरे-धीरे मिटने लगता है और प्रिय ही उसके जीवन का केंद्र बन जाता है।
ईश्वर तक पहुंचने के अनेक मार्ग बताए गए हैं ज्ञान, कर्म, योग और भक्ति। लेकिन प्रेम का मार्ग सबसे सहज है। जब हृदय में सच्चा प्रेम जागता है तो अहंकार अपने आप कमजोर पड़ने लगता है। शिकायतों की जगह स्वीकार आता है, अपेक्षाओं की जगह समर्पण और दूरी की जगह आत्मीयता जन्म लेती है। इसी कारण प्रेम को हर पीड़ा का अंत और हर शुभ का आरंभ कहा गया है।राधा इसी प्रेम की सर्वोच्च अनुभूति हैं।
"जो धरती के आकर्षण से नीचे की और बहे वो धारा और जो आकर्षण तोड़ कर ऊपर की ओर जाये वो राधा"
अर्थात धरती का आकर्षण किसी धारा को नीचे की ओर बहाता है। वह अपने उद्गम से निकलकर आगे बढ़ती है और अंततः सागर में मिलकर अपना अलग अस्तित्व खो देती है। लेकिन राधा की आध्यात्मिक यात्रा इसके विपरीत है। वे संसार के आकर्षण से ऊपर उठने की प्रेरणा देती हैं। बाहरी संसार से भीतर की ओर लौटना और अपने मूल स्रोत तक पहुंचना ही राधा तत्व का संकेत है।
मनुष्य का जीवन भी एक धारा जैसा ही है। जन्म से लेकर मृत्यु तक हम लगातार बाहर की ओर भागते रहते हैं, सुख, संपत्ति, प्रतिष्ठा, संबंध और इच्छाओं के पीछे। हमें लगता है कि अगली उपलब्धि हमें पूर्ण कर देगी, लेकिन एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी सामने खड़ी हो जाती है। राधा हमें इस दौड़ से हटाकर भीतर देखने की प्रेरणा देती हैं।
राधा का प्रेम हमें सिखाता है कि ईश्वर को पाने के लिए संसार से भागना आवश्यक नहीं है। आवश्यकता केवल इतनी है कि मन के भीतर बैठे अहंकार को धीरे-धीरे विदा किया जाए। जब ‘मैं’ कम होने लगता है, तब ‘तुम’ का अनुभव गहरा होने लगता है और यही अनुभव आगे चलकर भक्ति में बदल जाता है।
इसी भाव को एक सुंदर आध्यात्मिक प्रतीक में समझा जा सकता है, हर छूटती सांस कृष्ण है और हर भीतर आती सांस राधा। एक सांस हमें जीवन से बाहर की ओर ले जाती है और दूसरी फिर जीवन से जोड़ देती है। जैसे प्रत्येक क्षण राधा और कृष्ण का एक मौन संवाद हमारे भीतर चलता रहता हो।
कृष्ण जीवन के सार हैं तो राधा उस सार को अनुभव करने का आधार। कृष्ण परम चेतना हैं तो राधा उस चेतना तक पहुंचने वाली प्रेममयी अनुभूति। कृष्ण को जानने का प्रयास ज्ञान हो सकता है, लेकिन कृष्ण को हृदय से महसूस करना प्रेम है। और प्रेम की उसी अनुभूति का नाम राधा है।
इसलिए राधाष्टमी का पर्व केवल पूजा और उत्सव तक सीमित न रहे। यह हमारे लिए आत्मचिंतन का अवसर बने। हम अपने संबंधों में देखें कि हमारा प्रेम कितना निस्वार्थ है, हमारी भक्ति में कितनी अपेक्षा है और हमारे समर्पण में कितना अहंकार बचा हुआ है।
क्योंकि राधा का संदेश यही है कि प्रेम में सबसे बड़ी उपलब्धि किसी को पा लेना नहीं, बल्कि अपने भीतर के ‘मैं’ को खो देना है। जब अहंकार मिटता है तो प्रेम प्रकट होता है, और जहां प्रेम पूर्ण होता है, वहां भक्त और भगवान के बीच दूरी नहीं रह जाती। राधा उसी मिटती हुई दूरी का नाम हैं।
इस राधाष्टमी पर यदि हम राधा को सच में समझना चाहते हैं, तो केवल उनके चरणों में फूल चढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। अपने भीतर प्रेम, करुणा, समर्पण और अहंकार से मुक्ति के कुछ फूल भी खिलाने होंगे।
कृष्ण जीवन का सार हैं, राधा जीवन का आधार; कृष्ण परम सत्य हैं, तो उस सत्य तक पहुंचने वाली सबसे कोमल अनुभूति राधा हैं।

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