विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज
इंदौर। इंदौर में 70 से अधिक बिल्डरों को करीब 200 करोड़ रुपए के नोटिस ने नगर निगम और रियल एस्टेट कारोबार के बीच बड़ा टकराव खड़ा कर दिया है। मामला मध्यप्रदेश नगर पालिका (कॉलोनी विकास) नियम, 2021 में EWS-LIG के लिए शेल्टर फीस की व्यवस्था की व्याख्या से जुड़ा है। उपलब्ध नियमों में कॉलोनाइजर को EWS-LIG के लिए निर्धारित प्रावधान करने या नियम के मुताबिक शेल्टर फीस देने का विकल्प दिया गया है। ग्रुप हाउसिंग के लिए भी शेल्टर फीस का प्रावधान मौजूद है।
विवाद तब गहराया जब निगम ने 2021 के बाद स्वीकृत मल्टी और आवासीय प्रोजेक्ट्स को लेकर अतिरिक्त वसूली के नोटिस जारी किए। बिल्डरों के मुताबिक कई परियोजनाओं को निगम से स्वीकृति और पूर्णता प्रमाणपत्र पहले ही मिल चुके हैं तथा उस समय निर्धारित शुल्क जमा कराया गया था। अब वर्षों बाद उसी परियोजनाओं से अतिरिक्त राशि मांगने पर सवाल उठ रहे हैं।
CREDAI का तर्क है कि एक ही भूखंड पर बनी मल्टी को हर मामले में ‘कॉलोनी’ मानकर शुल्क लगाना नियम की गलत व्याख्या है। संगठन ने महापौर पुष्यमित्र भार्गव और निगमायुक्त क्षितिज सिंघल के सामने आपत्ति रखी और समाधान नहीं निकलने पर हाईकोर्ट का रुख किया। CREDAI की ओर से 2026 में निगम आयुक्त के साथ अन्य नियामकीय मुद्दों पर बैठक होने की पुष्टि उसके न्यूजलेटर में भी दर्ज है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि नियम 2021 से लागू था तो पिछले वर्षों में स्वीकृति देने और पूर्णता प्रमाणपत्र जारी करने के दौरान यह शुल्क किस आधार पर नहीं वसूला गया? और यदि उस समय निगम की गणना सही थी तो अब नई व्याख्या का आधार क्या है?
निगम की ओर से कार्रवाई को नियमों के अनुरूप बताया जा रहा है, जबकि बिल्डर पक्ष इसे एकतरफा वित्तीय भार बता रहा है। हाईकोर्ट में मामला विचाराधीन होने के कारण अब विवाद का अंतिम कानूनी अर्थ अदालत की व्याख्या से स्पष्ट होगा।
यह सिर्फ 200 करोड़ की वसूली का मामला नहीं है। असली सवाल है—नियम एक था तो उसकी व्याख्या पांच साल बाद क्यों बदली और इसकी कीमत अब बिल्डरों से क्यों मांगी जा रही है?

Post a Comment