सरकार बताए—नौकरशाही चल रही है या कुर्सियों का कॉम्बो पैक?
विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज
भोपाल। मध्यप्रदेश की नौकरशाही का गणित भी गजब है—68 IAS पद खाली हैं, लेकिन कई अफसरों की मेज पर विभागों की फाइलें इतनी हैं कि कुर्सी छोटी पड़ जाए! सवाल यह नहीं कि अधिकारी कितने सक्षम हैं; सवाल यह है कि सरकार को हर बड़ी जिम्मेदारी के लिए बार-बार वही कुछ चेहरे क्यों दिखाई देते हैं?
अप्रैल 2026 के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 459 स्वीकृत IAS पदों के मुकाबले 391 अधिकारी पदस्थ थे। यानी 68 पद खाली। इसके बावजूद विभागों और संस्थाओं का अतिरिक्त प्रभार लगातार बांटा जा रहा है।
सबसे ज्यादा चर्चा मनीष सिंह के प्रभारों की है। फरवरी के आदेश के मुताबिक जनसंपर्क के साथ परिवहन, मध्यप्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम, इंटर स्टेट ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी, यात्री परिवहन एवं अधोसंरचना और मध्यप्रदेश माध्यम जैसे महत्वपूर्ण दायित्व उनके पास रहे। यानी प्रचार से लेकर परिवहन तक—फाइलों की रफ्तार का एक्सप्रेसवे भी एक ही मेज से!
सितंबर में भी अतिरिक्त प्रभार का सिलसिला जारी रहा। रघुराज एमआर, तरुण राठी, कुमार पुरुषोत्तम, शीतला पटले और अनिशा श्रीवास्तव को अलग-अलग अतिरिक्त जिम्मेदारियां दी गईं।
*अब व्यंग्य में सवाल यही है—सरकार के पास IAS कम हैं या भरोसेमंद कुर्सियां कम?*
यदि अधिकारी कम हैं तो रिक्त पद भरने की समयसीमा क्या है? और यदि अधिकारी पर्याप्त हैं तो अतिरिक्त प्रभार का स्थायी खेल क्यों?
*भ्रष्टाचार पर आरोप नहीं, रिकॉर्ड पर सवाल*
मनीष सिंह या किसी अन्य अधिकारी पर बिना जांच भ्रष्टाचार का आरोप लगाना उचित नहीं। लेकिन जिन विभागों में ठेके, लाइसेंस, सरकारी खरीद, विज्ञापन और करोड़ों रुपये के आर्थिक फैसले होते हैं, वहां जिम्मेदारियों का इतना केंद्रीकरण पारदर्शिता और निगरानी पर सवाल जरूर खड़ा करता है । कितनी शिकायतें आईं, कितनी जांच बैठी और कितने मामलों में अनियमितता आधिकारिक रूप से साबित हुई।और सभी जानते हैं कि मनीष सिंह कहां से आए हैं और कितना भ्रष्टाचार किया है उनका पिछला बैकग्राउंड देखे तो उन्हें IAS क्या ..... ?
*जनसंपर्क—जहां सरकारी विज्ञापन भी सवाल बन गए*
जनसंपर्क विभाग का मामला भी इसी से जुड़ता है। 15 अगस्त के सरकारी विज्ञापनों को लेकर छोटे प्रकाशनों की शिकायतें सामने आई हैं। वेबसाइट पर 15 अगस्त 2026 के प्रदर्शन विज्ञापनों के लिए आवेदन, प्रसार संख्या, नियमितता प्रमाण-पत्र और अन्य पात्रता शर्तें स्पष्ट दर्ज हैं। अभी तक 1136 लोगों को विज्ञापन नही दिया गया है। क्योंकि साहब कुसी पर बेठते ही नहीं है। नाहि किसी का फोन उठाते है।ऐसे लोगों को मोहन सरकार ने कुर्सी बैठ कर रखा है ।
ऐसे मामलों में सरकार को पात्रता, प्रसार, आवेदन और विज्ञापन आवंटन का रिकॉर्ड सार्वजनिक करके सवालों का जवाब देना चाहिए।
*मोहन सरकार भी कम विभागों वाली सरकार नहीं*
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पास शुरुआत से ही सामान्य प्रशासन, गृह, जेल, औद्योगिक नीति एवं निवेश प्रोत्साहन, जनसंपर्क, नर्मदा घाटी विकास, विमानन, खनिज साधन, लोक सेवा प्रबंधन और प्रवासी भारतीय विभाग सहित कई विभाग रहे हैं।
यानी ऊपर से नीचे तक सवाल एक ही—जिम्मेदारियां जितनी ज्यादा, निगरानी उतनी मजबूत है या फाइलों का बोझ ही प्रशासन बन गया है?
जनता पूछ रही है—‘एक अफसर, इतने विभाग’ का हिसाब कौन देगा?
क्या 68 रिक्त पदों को भरने की समयबद्ध योजना है?
क्या अतिरिक्त प्रभार की कोई अधिकतम समयसीमा होगी?
कितनी फाइलें बहु-प्रभार वाले अधिकारियों के पास लंबित हैं?
और क्या सरकार विभागवार अतिरिक्त प्रभार और लंबित फाइलों का सार्वजनिक ऑडिट कराएगी?
क्योंकि लोकतंत्र में कुर्सियां चाहे खाली हों या भरी—जवाबदेही की कुर्सी खाली नहीं रहनी चाहिए।
मोहन सरकार को अब सिर्फ आदेश जारी नहीं करने, इन सवालों का हिसाब भी देना होगा।

Post a Comment