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36 हजार से ज्यादा नाबालिग बच्चियां लापता, मोहन सरकार के सामने बड़ा सवाल: 2025 में हर दिन 36 बच्चियां हुईं गायब

 

तीन साल में 36,303 मामले; भोपाल में ही 1,968 गुमशुदगियां — केंद्र ने गृह सचिव से मांगी कार्रवाई, अब सवाल ‘कितनी लौटीं और कितनी अब भी लापता?’


प्रणव बजाज


मध्यप्रदेश में नाबालिग बच्चियों की गुमशुदगी का आंकड़ा अब सिर्फ पुलिस रिकॉर्ड नहीं, बल्कि सरकार की बाल सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल बनता जा रहा है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2023 से 2025 के बीच प्रदेश में 36,303 नाबालिग बच्चियों के लापता होने के मामले दर्ज हुए। इनमें 2023 में 11,250, 2024 में 11,907 और 2025 में 13,146 मामले सामने आए। यानी तीन साल में आंकड़ा लगातार ऊंचा रहा और 2025 में औसतन हर दिन करीब 36 नाबालिग बच्चियों की गुमशुदगी दर्ज हुई।



2025 के पुलिस आंकड़ों पर आधारित एक रिपोर्ट के मुताबिक, उस साल 13,146 नाबालिग बच्चियों के गुम होने के मामलों में 2,418 के प्रेमी के साथ जाने और 5,692 के घर से नाराज होकर जाने की बात दर्ज की गई। रिपोर्ट में अन्य कारणों के रूप में रिश्तेदारों के यहां जाना, आर्थिक परेशानी और रास्ता भटकना भी दर्ज है।


राजधानी भोपाल की तस्वीर भी सवाल खड़े करती है। 2023 में 616, 2024 में 721 और 2025 में 631 नाबालिग बच्चियों की गुमशुदगी दर्ज हुई। तीन वर्षों में यह संख्या 1,968 है।


केंद्र के पत्र के बाद सरकार के सामने जवाबदेही


कटनी के अधिवक्ता अवनीश तिवारी ने इन आंकड़ों को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय में शिकायत कर दो महीने का विशेष अभियान चलाकर लापता बच्चियों की तलाश कराने की मांग की। उनके अनुसार शिकायत के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय के महिला सुरक्षा विभाग ने मध्यप्रदेश के गृह सचिव को पत्र भेजकर आवश्यक कार्रवाई और निवारण के निर्देश दिए हैं।


अब सवाल सीधे मोहन सरकार और पुलिस मुख्यालय से है—इन 36,303 मामलों में कितनी बच्चियां बरामद हुईं? कितने मामले अभी लंबित हैं? कितनी बच्चियों का पता आज तक नहीं चला? और क्या प्रदेश में ऐसे मामलों की जिला स्तर पर नियमित समीक्षा हो रही है?


कटनी में रिकवरी का दावा, लेकिन आंकड़ों की दूसरी तस्वीर


कटनी एसपी अभिनय विश्वकर्मा के मुताबिक जनवरी 2024 से अगस्त 2026 तक जिले में 724 नाबालिग बच्चियों की गुमशुदगी दर्ज हुई, जबकि पुलिस ने 894 बच्चियों को दस्तयाब किया। पुलिस के अनुसार 123.48 प्रतिशत की रिकवरी इसलिए दिखाई देती है क्योंकि बरामदगी में पिछले वर्षों के लंबित मामलों की बच्चियां भी शामिल हो सकती हैं।


यही अंतर पूरे प्रदेश में स्पष्ट करने की जरूरत है। गुमशुदगी के कुल मामलों और बरामदगी के कुल आंकड़ों को अलग-अलग वर्षवार तथा जिलेवार सार्वजनिक किए बिना वास्तविक स्थिति कितनी साफ होगी?


सरकार के सामने अब केवल नए मामले रोकने की चुनौती नहीं है। असली सवाल यह है कि जो बच्चियां घर से निकल गईं, उनमें से हर बच्ची तक पुलिस कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से पहुंची?


36 हजार से ज्यादा मामलों के बाद जनता यह जानना चाहती है कि मोहन सरकार की बाल सुरक्षा व्यवस्था में अगला ठोस कदम क्या होगा—विशेष अभियान, जवाबदेही तय करना या केवल आंकड़ों की समीक्षा?

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