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सोम डिस्टिलरीज पर 19 सवालों का पुलिंदा, फर्जी परमिट से कस्टम्स कार्रवाई तक

चार फरवरी को 8 लाइसेंस निलंबित, 23 मार्च को हाईकोर्ट से राहत नहीं; अप्रैल में डबल बेंच ने भी चुनौती खारिज की—अब 2026-27 के लाइसेंस नवीनीकरण पर भी सवाल

विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज

भोपाल। मध्यप्रदेश के शराब कारोबार में सोम डिस्टिलरीज समूह का नाम एक बार फिर गंभीर नियामकीय विवादों के केंद्र में है। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड में 2011 के उस प्रकरण का स्पष्ट उल्लेख है, जिसमें रायसेन से दीव ले जाई जा रही 1200 पेटी ब्लू चिप व्हिस्की के परिवहन से जुड़े परमिटों को लेकर मामला सामने आया। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार इस प्रकरण में संतोष गडरिया और ओमप्रकाश लोधी को आबकारी अधिनियम के तहत तथा उमाशंकर शर्मा, दिनकर सिंह, मोहन सिंह तोमर, दीनानाथ सिंह और शैलेंद्र सिंह समेत अन्य आरोपियों को आपराधिक धाराओं में दोषसिद्धि हुई। कंपनी से जुड़े रिकॉर्ड में गुरुदर्शन अरोड़ा और सुरजीत लाल के नाम भी आपराधिक अपीलों के संदर्भ में सामने आते हैं।



इसी प्रकरण को आधार बनाकर आबकारी आयुक्त ने 4 फरवरी 2026 को सोम डिस्टिलरीज प्राइवेट लिमिटेड और सोम डिस्टिलरीज एंड ब्रुअरीज प्राइवेट लिमिटेड के कुल आठ लाइसेंस निलंबित किए। कंपनी ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 23 मार्च 2026 को याचिका खारिज हो गई। अदालत ने रिकॉर्ड में फर्जी परमिटों से जुड़े आरोप, पांच कर्मचारियों की दोषसिद्धि और कंपनी की ओर से प्रस्तुत जवाबों पर विस्तार से चर्चा की।

मामला यहीं नहीं रुका। अप्रैल 2026 के डिवीजन बेंच आदेश में भी लाइसेंस निलंबन को चुनौती देने वाली अपील खारिज हुई।

इसके बाद 2025 में कस्टम्स विभाग की कार्रवाई का रिकॉर्ड भी सामने आता है। 10 और 11 सितंबर 2025 को कस्टम्स की तलाशी में ड्यूटी-फ्री आयातित खाली बोतलों और कैनों को घरेलू बाजार में इस्तेमाल किए जाने का आरोप लगाया गया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कंपनी ने जांच के दौरान करीब ₹14 करोड़ कस्टम्स ड्यूटी जमा की, जबकि अंतिम देयता का आकलन जांच के अधीन बताया गया। अगस्त 2026 के हाईकोर्ट आदेश में इस कस्टम्स जांच और आयातित बोतल-कैन के कथित डायवर्जन का उल्लेख भी है।


कंपनी के 2026 वार्षिक प्रतिवेदन में जगदीश कुमार अरोड़ा को चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर बताया गया है। प्रमोटर समूह में सुनीता अरोड़ा, दीपक अरोड़ा, अजय कुमार अरोड़ा, नताशा अरोड़ा तथा अन्य संबंधित इकाइयों के नाम दर्ज हैं।


19 आरोपों की फाइल—लेकिन हर आरोप का दस्तावेज जरूरी




बिना अनुमति प्लांट लगाने का आरोप—₹1 लाख की कथित पेनल्टी का दावा; मूल विभागीय आदेश की जरूरत।





19 टैंक बिना अनुमति लगाने का आरोप—फैक्ट्री लंबे समय तक बंद रहने का दावा; विभागीय रिकॉर्ड से पुष्टि अपेक्षित।





एक्सपायरी बीयर के लेबल बदलने का आरोप—दिल्ली भेजे जाने के दावे की स्वतंत्र दस्तावेजी पुष्टि जरूरी।





सैनिटाइजर के नाम पर मदिरा भेजने का आरोप—2020 में इसी व्यापक विवाद में GST विभाग ने उत्पादन और बिक्री से जुड़े आंकड़ों पर कार्रवाई की थी।





GST चोरी का आरोप—जगदीश अरोड़ा और अजय अरोड़ा की 2020 में GST मामले में गिरफ्तारी का न्यायिक रिकॉर्ड उपलब्ध है; विभाग के आरोपों और कंपनी के बचाव को अलग-अलग देखना जरूरी है।





इंदौर में कथित फर्जी होलोग्राम वाली शराब—इस दावे की पुष्टि जब्ती, एफआईआर और आबकारी रिकॉर्ड से होना बाकी।





दूसरे ब्रांड की बोतलों में बीयर भरने का आरोप—1.41 लाख पेटी बीयर नष्ट किए जाने के दावे का मूल पंचनामा सामने आना जरूरी।





2005 की देशी मदिरा सप्लाई और करीब ₹16 करोड़ का विवाद—हाईकोर्ट आदेश और वास्तविक भुगतान स्थिति की जांच आवश्यक।





दूसरे नामों से शराब दुकानें संचालित करने का आरोप—लाइसेंस, साझेदारी और वास्तविक लाभार्थी संबंधी रिकॉर्ड निर्णायक होंगे।





फर्जी परिवहन परमिट मामला—यह सबसे मजबूत दस्तावेजी कड़ी है। 2011 के परिवहन विवाद में 1200 पेटी शराब, कथित फर्जी परमिट और बाद की दोषसिद्धियों का उल्लेख हाईकोर्ट रिकॉर्ड में है।





आत्महत्या वीडियो में जगदीश अरोड़ा का नाम लेने का दावा—अत्यंत गंभीर आरोप; उपलब्ध FIR, जांच और न्यायिक रिकॉर्ड के बिना इसे स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।





कोरोना काल के चार्टर्ड विमान का आरोप—खर्च और यात्रा से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध होने पर ही निष्कर्ष संभव।





आयकर छापे में रिकॉर्ड छुड़ाने का आरोप—आयकर और पुलिस रिकॉर्ड से पुष्टि अपेक्षित।





गुजरात में कथित अवैध शराब नेटवर्क—FIR, जब्ती और जांच एजेंसी की चार्जशीट जरूरी।





आबकारी अधिकारियों के बच्चों को फ्रेंचाइजी दिलाने का आरोप—दस्तावेजी लेन-देन के बिना इसे आरोप से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।





54 हजार पेटी बीयर का विवाद—मूल जब्ती/नष्टकरण/विभागीय आदेश सामने आना जरूरी।





मुरैना में कारावास का दावा—केस नंबर और न्यायालय रिकॉर्ड के बिना नाम जोड़ना उचित नहीं।





विदेशी ऑर्डर के नाम पर शराब भेजने का आरोप—निर्यात दस्तावेज, ऑर्डर, बिल और जांच रिकॉर्ड जरूरी।





प्रदूषण विभाग में कथित फर्जी दस्तावेज—MPPCB की मूल कार्रवाई से पुष्टि अपेक्षित।






2026 ने पुराने सवाल फिर सामने ला दिए


यह मामला केवल पुराने आरोपों की सूची नहीं है। 2026 में आबकारी लाइसेंस निलंबन, हाईकोर्ट की कार्यवाही, लाइसेंस नवीनीकरण विवाद और कस्टम्स जांच अलग-अलग नियामकीय मोर्चों पर सामने आए हैं। जून 2026 में मीडिया रिपोर्टों ने भी बताया कि समूह की कुछ इकाइयों के 2026-27 के आबकारी लाइसेंस नवीनीकरण आवेदन राज्य सरकार ने स्वीकार नहीं किए और इसके पीछे फर्जी परमिट, अवैध परिवहन तथा राजस्व संबंधी आरोपों का हवाला दिया गया।


अब असली सवाल यह है—19 में से कितने आरोप केवल आरोप हैं और कितनों के पीछे विभागीय आदेश, FIR, चार्जशीट, न्यायालय का फैसला या अन्य प्राथमिक दस्तावेज मौजूद हैं? यही अगली जांच का केंद्र होना चाहिए।


कंपनी की ओर से न्यायिक मामलों में उठाए गए बचाव और उसके स्टॉक-एक्सचेंज खुलासों को भी इसी के साथ प्रकाशित किया जाना जरूरी है, ताकि आरोप और स्थापित न्यायिक तथ्य अलग-अलग रहें।

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