2018-23 के बिलों में फर्जी वर्क ऑर्डर, माप पुस्तिकाएं और भुगतान का आरोप; ED के उपलब्ध रिकॉर्ड में मनीष सिंह आरोपी नहीं—फिर कलेक्टर रहते निगरानी की पड़ताल क्यों नहीं?
विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज
इंदौर। इंदौर नगर निगम के कथित फर्जी बिल प्रकरण ने अब सरकारी सिस्टम की उस पूरी श्रृंखला पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें वर्क ऑर्डर से लेकर माप पुस्तिका, पूर्णता प्रमाण-पत्र, बिल, ऑडिट और भुगतान तक की प्रक्रिया शामिल होती है। प्रवर्तन निदेशालय ने 24 जुलाई 2026 को 32 आरोपियों के खिलाफ करीब 20 हजार से अधिक पन्नों की अभियोजन शिकायत विशेष PMLA अदालत में दाखिल की। ED की जांच में सरकारी धन के कथित दुरुपयोग की राशि करीब ₹103.42 करोड़ तक पहुंचने की बात सामने आई है।
जांच एजेंसी के अनुसार कथित फर्जीवाड़े में फर्जी वर्क ऑर्डर, माप पुस्तिकाएं, पूर्णता प्रमाण-पत्र, बिल और नोटशीट का इस्तेमाल कर ऐसे कार्यों के भुगतान कराए गए, जिनके वास्तविक निष्पादन पर गंभीर सवाल उठे। कुछ मामलों में कथित तौर पर वास्तविक कार्य की तुलना में अधिक भुगतान अथवा दोहरे भुगतान की बात भी जांच में सामने आई।
आंकड़ा बढ़ता गया, सवाल भी
3 जून 2026 की ED कार्रवाई में 2018 से 2023 के दौरान करीब ₹119.53 करोड़ के कथित फर्जी बिल और लगभग ₹86.54 करोड़ के भुगतान का उल्लेख किया गया था। 2018 से पहले की करीब ₹6.22 करोड़ की राशि जोड़कर उस चरण में अपराध की अनुमानित राशि करीब ₹92.76 करोड़ बताई गई थी। आगे की जांच में ED ने कथित तौर पर सरकारी धन की siphoning की राशि करीब ₹103.42 करोड़ आंकी।
यानी जांच आगे बढ़ी तो फाइल में रकम का आंकड़ा भी बढ़ता गया और सवाल भी।
अब मनीष सिंह के कार्यकाल की तारीख महत्वपूर्ण क्यों?
मनीष सिंह 2020 से 2022 के बीच इंदौर कलेक्टर रहे। वहीं ED द्वारा जांची गई कथित फर्जी बिलों की अवधि 2018 से 2023 बताई गई है। दोनों समयावधियों के बीच सीधा ओवरलैप है।
लेकिन यहां तथ्य और आरोप के बीच अंतर बेहद महत्वपूर्ण है। ED की उपलब्ध आधिकारिक जानकारी में मनीष सिंह को इस मामले में आरोपी के रूप में नामित नहीं किया गया है। इसलिए उनके खिलाफ किसी तरह की आपराधिक भूमिका का निष्कर्ष निकालना उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर उचित नहीं होगा।
फिर भी प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल अपनी जगह है।
क्या उनके कलेक्टर कार्यकाल के दौरान निगम से संबंधित ऐसी कोई शिकायत, ऑडिट आपत्ति, वित्तीय अनियमितता या भुगतान संबंधी रिपोर्ट जिला प्रशासन के संज्ञान में आई थी?
यदि आई थी तो उस पर क्या कार्रवाई हुई?
यदि नहीं आई तो इतनी बड़ी कथित वित्तीय अनियमितता प्रशासनिक निगरानी की कई परतों को पार कैसे करती रही?
कागजों पर विकास इतना तेज कि जमीन पीछे छूट गई!
सरकारी फाइल में काम हुआ।
वर्क ऑर्डर बना।
माप पुस्तिका बनी।
पूर्णता प्रमाण-पत्र बना।
बिल तैयार हुआ।
ऑडिट हुआ।
भुगतान हुआ।
और फिर जांच एजेंसी ने सवाल उठाया—काम हुआ कहां?
कागजों पर विकास इतना तेज दौड़ा कि जमीन तक पहुंचने की जरूरत ही नहीं पड़ी!
व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन असली सवाल इससे कहीं बड़ा है—यदि जांच एजेंसी के आरोप अदालत में प्रमाणित होते हैं तो कथित फर्जीवाड़े की जिम्मेदारी केवल उन लोगों तक सीमित रहेगी जिन्होंने बिल बनाए या भुगतान हासिल किया, या फिर उस पूरी प्रशासनिक श्रृंखला की भी जांच होगी जिसके अलग-अलग स्तरों से ये दस्तावेज गुजरते रहे?
32 आरोपी, करोड़ों की संपत्ति पर कार्रवाई
ED की कार्रवाई में ठेकेदारों, निगम से जुड़े अधिकारियों तथा अन्य लोगों के नाम सामने आए हैं। एजेंसी ने अभय सिंह राठौर, मोहम्मद जाकिर और राहुल बड़ेरा को जून 2026 में गिरफ्तार किए जाने की जानकारी दी थी। जांच में फर्जी बिलों से जुड़ी फर्मों को भुगतान और कथित अपराध की आय को अलग-अलग माध्यमों से आगे स्थानांतरित किए जाने की बात कही गई।
जुलाई 2026 तक ED ने करीब ₹59.18 करोड़ की संपत्तियों को जब्त, फ्रीज या अटैच किए जाने की जानकारी दी। हालांकि अभियोजन शिकायत में लगाए गए आरोपों का अंतिम परीक्षण अदालत में होना बाकी है।
पूर्व आयुक्तों की भूमिका पर सवाल पहले भी उठे
इस प्रकरण में 2024 के दौरान तत्कालीन पूर्व निगम आयुक्तों मनीष सिंह और प्रतिभा पाल की प्रशासनिक भूमिका की जांच की मांग भी सार्वजनिक रूप से सामने आई थी। उस समय यह बात कही गई थी कि जांच में यदि किसी अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो कार्रवाई की जाएगी।
अब जब ED की जांच 32 आरोपियों और ₹103.42 करोड़ की कथित सरकारी धनराशि तक पहुंच चुकी है, तब पुराना सवाल फिर सामने है—क्या उस समय की प्रशासनिक निर्णय-प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच हुई थी?
यदि हुई थी तो उसका परिणाम क्या रहा?
यदि नहीं हुई तो क्यों?
और यदि किसी अधिकारी को जांच में कोई भूमिका नहीं मिली तो सरकार उस रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने से क्यों बचे?
फाइलों की पूरी चेन सामने आए
₹103 करोड़ के इस प्रकरण में केवल यह पता लगाना पर्याप्त नहीं कि पैसा किसके खाते में गया। यह भी सामने आना चाहिए कि भुगतान की प्रक्रिया किस-किस अधिकारी और कर्मचारी से होकर गुजरी।
किसने वर्क ऑर्डर तैयार किया?
किसने उसे स्वीकृत किया?
किसने माप पुस्तिका प्रमाणित की?
किसने पूर्णता प्रमाण-पत्र जारी किया?
किस अधिकारी ने बिल पास किया?
किस स्तर पर भुगतान की अनुमति मिली?
ऑडिट में क्या आपत्तियां उठीं?
और यदि आपत्तियां उठीं तो उनका निराकरण किसने किया?
यही वह प्रशासनिक चेन है जिससे सरकारी धन की निगरानी होती है।
मनीष सिंह पर भी यही कसौटी लागू हो
मनीष सिंह का नाम ED की उपलब्ध आरोपी सूची में नहीं है। इसलिए उन्हें इस कथित घोटाले का आरोपी बताना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन उनका कलेक्टर कार्यकाल कथित फर्जी बिलों की जांच की समयावधि के बीच आता है।
ऐसे में सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि उस अवधि में इंदौर नगर निगम से संबंधित बड़े भुगतान, ऑडिट रिपोर्ट, शिकायतें और वित्तीय अनियमितताओं की कौन-कौन सी रिपोर्ट जिला प्रशासन तक पहुंची थीं।
यदि कोई जांच हुई और मनीष सिंह की भूमिका नहीं पाई गई—रिकॉर्ड सामने आए।
यदि कोई जांच लंबित है—उसकी वर्तमान स्थिति बताई जाए।
और यदि ऐसी कोई जांच हुई ही नहीं—तो उसका कारण भी सार्वजनिक किया जाए।
क्योंकि सवाल किसी अधिकारी को बिना सबूत कटघरे में खड़ा करने का नहीं है।
सवाल यह है कि ₹103 करोड़ के कथित फर्जी बिलों की पूरी प्रशासनिक जवाबदेही की फाइल आखिर खुलेगी कब?
ED पैसे के रास्ते की जांच कर रही है।
अब जनता यह जानना चाहती है कि फाइलों का रास्ता कौन देखेगा?
क्योंकि सरकारी धन केवल खाते से नहीं निकलता।
पहले वह फाइल में चलता है।
और फाइल कई मेजों से गुजरती है।
अब उन मेजों के नाम सामने आने चाहिए।

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