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जांच के डर से तहसील में सन्नाटा

बिलासपुर। कथित सर्पदंश मुआवजा घोटाले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, बिलासपुर तहसील कार्यालय में कर्मचारियों की कमी ने प्रशासन के सामने नई मुश्किल खड़ी कर दी है। स्थिति यह है कि रिकॉर्ड संभालने के लिए अब पटवारियों को भी जिम्मेदारी देनी पड़ रही है। प्रशासन ने कामकाज प्रभावित न हो, इसके लिए चार नए लिपिकों की पदस्थापना की है। 



यह वही मामला है जिसमें फर्जी सर्पदंश मौतों के आधार पर करोड़ों रुपये का मुआवजा निकालने के आरोप सामने आए हैं। जांच में अब तक 19 लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आ चुकी है। गिरफ्तार लोगों में राजस्व विभाग के कर्मचारी, तहसील कार्यालय के लिपिक, एसडीएम कार्यालय के कर्मचारी, पुलिसकर्मी, डॉक्टर, वकील और जनप्रतिनिधि तक शामिल बताए गए हैं। 


आरोप है कि फर्जी दस्तावेज, पंचनामा, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और राजस्व रिकॉर्ड के सहारे मुआवजा प्रकरण तैयार किए गए। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि दस्तावेज किसने तैयार किए, किसने सत्यापित किए और अंतिम मंजूरी तक फाइल कैसे पहुंची। 


सबसे बड़ा सवाल रिकॉर्ड की सुरक्षा को लेकर है। जिस तहसील कार्यालय के पुराने रिकॉर्ड अब जांच के केंद्र में हैं, वहां कर्मचारियों की कमी के कारण पटवारियों को रिकॉर्ड रूम की जिम्मेदारी देना अपने आप में गंभीर स्थिति बताता है।


मामला सिर्फ 17 करोड़ रुपये के कथित मुआवजा घोटाले का नहीं है—सवाल यह है कि सरकारी रिकॉर्ड की रखवाली करने वाली पूरी व्यवस्था में आखिर कौन-कौन शामिल था?

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