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करोड़ों खर्च, फिर भी हवा जहरीली और यमुना मैली

 


सीएजी की रिपोर्ट ने खोली व्यवस्था की पोल; अब खर्च से ज्यादा जवाबदेही और निगरानी की जरूरत


दिल्ली में प्रदूषण से निपटने और यमुना को साफ करने पर वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन जमीन पर नतीजे अब भी सवाल खड़े कर रहे हैं। दिल्ली सरकार ने वर्ष 2026-27 के हरित बजट में पर्यावरण से जुड़े कार्यों के लिए 22,236 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इसमें वायु प्रदूषण और यमुना पुनर्जीवन प्रमुख लक्ष्य हैं।



यमुना की सफाई को लेकर हालिया सीएजी निष्कर्ष ज्यादा गंभीर हैं। रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली जल बोर्ड ने राजधानी में पैदा होने वाले सीवेज का आकलन ही कम किया। 2017-21 के दौरान प्रस्तावित 56 नए सीवेज शोधन संयंत्रों में से कोई भी पूरा नहीं हुआ। इससे यमुना में पहुंच रहे प्रदूषण के वास्तविक भार को नियंत्रित करने की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं।


वायु प्रदूषण के मोर्चे पर भी निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल उठे हैं। संसदीय समिति ने पाया कि वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों का वितरण दिल्ली के सभी इलाकों का समान प्रतिनिधित्व नहीं करता। समिति ने ज्यादा प्रदूषित और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में निगरानी नेटवर्क मजबूत करने की सिफारिश की है।


अब चुनौती केवल नया बजट बनाने की नहीं, बल्कि हर रुपये के परिणाम का हिसाब लेने की है। सीवेज का वास्तविक आकलन, नालों की निगरानी, औद्योगिक प्रदूषण पर कार्रवाई, प्रदूषण स्रोतों की पहचान और विभागीय जिम्मेदारी तय किए बिना योजनाएं कागज पर ही रह सकती हैं।


सवाल सीधा है—अगर वर्षों के खर्च के बाद भी हवा सांस लेने लायक और यमुना नहाने लायक नहीं हुई, तो जवाबदेही आखिर तय होगी कब?

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