भारत के कार्यस्थलों में अब केवल वेतन ही नहीं, पदनाम और वास्तविक जिम्मेदारी भी चर्चा का विषय बन गई है। इंडीड के ताजा त्रैमासिक रोजगार सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में करीब 10 में से 6 पेशेवरों का मानना है कि उनका पदनाम उनके वेतन के अनुरूप नहीं है। यह सर्वेक्षण 1,211 नियोक्ताओं और 2,533 कर्मचारियों की प्रतिक्रियाओं पर आधारित है।
रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू पदनामों का बढ़ता चलन है। करीब 80 प्रतिशत कर्मचारियों ने माना कि कंपनियों में ऐसे पदनाम आम हो गए हैं, जो सुनने में वरिष्ठ और आकर्षक लगते हैं, लेकिन उनके साथ समान अनुपात में वेतन नहीं बढ़ता। यानी कर्मचारी को बड़ा पद तो मिलता है, लेकिन जेब में उसका असर दिखाई नहीं देता।
पदोन्नति के बाद भी स्थिति पूरी तरह बेहतर नहीं है। पिछले दो वर्षों में पदनाम बदलने वाले करीब एक-तिहाई कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें या तो कोई वेतन वृद्धि नहीं मिली या वृद्धि 5 प्रतिशत से कम रही।
यह स्थिति कंपनियों के लिए भी चुनौती बन सकती है। कर्मचारी केवल पदनाम नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के अनुरूप वेतन, सम्मान और भविष्य की प्रगति चाहते हैं। यदि पदनाम बढ़ता रहे और वेतन पीछे रह जाए, तो असंतोष और नौकरी बदलने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
सवाल अब यह है—क्या बड़ा पदनाम कर्मचारी की वास्तविक तरक्की है, या सिर्फ वेतन बढ़ाए बिना उसे रोकने का नया तरीका?

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