केरल विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मोहन कुन्नुम्मल की ‘वंदे मातरम्’ को लेकर की गई टिप्पणी ने राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। तिरुवनंतपुरम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यक्रम में बोलते हुए कुन्नुम्मल ने कथित तौर पर कहा कि जो लोग वंदे मातरम् का विरोध करते हैं, वे अपनी मां को नहीं पहचानते। उन्होंने कहा कि जो मां का अर्थ समझते हैं, वे वंदे मातरम् का सम्मान करेंगे।
कुलपति की टिप्पणी सामने आते ही राजनीतिक विरोध शुरू हो गया। आलोचकों ने सवाल उठाया कि विश्वविद्यालय जैसे संवैधानिक और शैक्षणिक संस्थान के प्रमुख पद पर बैठे व्यक्ति को राजनीतिक या वैचारिक विवादों से जुड़े मुद्दों पर इस तरह की भाषा इस्तेमाल करनी चाहिए या नहीं।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब केरल के तीन विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रम में मौजूदगी को लेकर भी राज्य में राजनीतिक घमासान चल चुका है। मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन ने कुलपतियों की मौजूदगी को गंभीर चूक बताते हुए उनसे माफी मांगने को कहा था। विपक्ष ने इसे उच्च शिक्षा क्षेत्र में कथित वैचारिक हस्तक्षेप का मामला बताया था।
वंदे मातरम् भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा ऐतिहासिक राष्ट्रगीत है, लेकिन इसे लेकर अलग-अलग राजनीतिक और धार्मिक मत भी रहे हैं।
अब सवाल केवल एक बयान का नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय के कुलपति के पद की निष्पक्षता और गरिमा का है। क्या देशभक्ति की बहस में असहमति रखने वालों को इस तरह कटघरे में खड़ा करना उचित है? केरल में इसी सवाल ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है।

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