सर्वोच्च न्यायालय का बड़ा फैसला; चयन के बाद दो साल की प्रशिक्षण व्यवस्था, नए नियम 2027 से लागू होंगे
नई दिल्ली। न्यायिक सेवा में प्रवेश की तैयारी कर रहे कानून के विद्यार्थियों और युवा वकीलों के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने बड़ा बदलाव किया है। न्यायालय ने सिविल जज (कनिष्ठ श्रेणी) की सीधी भर्ती के लिए अनिवार्य तीन वर्ष की वकालत की शर्त घटाकर एक वर्ष कर दी है। यह बदलाव उन अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है, जो कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद न्यायिक सेवा में जाना चाहते हैं।
नए ढांचे में न्यायालय ने व्यावहारिक अनुभव की आवश्यकता को पूरी तरह खत्म नहीं किया है। चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति से पहले एक वर्ष का गहन प्रशिक्षण राज्य न्यायिक अकादमी में करना होगा। इसके बाद एक वर्ष की संरचित विधिक सहायक अवधि होगी। इसमें पहले छह महीने प्रधान जिला न्यायाधीश या उच्चतर न्यायिक सेवा के अधिकारियों के साथ और अगले छह महीने संबंधित उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के अधीन काम करना होगा।
अर्थात केवल परीक्षा पास कर लेना तत्काल नियमित न्यायाधीश बनने की गारंटी नहीं होगी। चयन के बाद प्रशिक्षण और न्यायालयीन कार्य का व्यावहारिक अनुभव अनिवार्य रहेगा।
पुराने नियम से बड़ा बदलाव
मई 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रवेश स्तर की न्यायिक सेवा के लिए तीन वर्ष की वकालत अनिवार्य की थी। उस समय न्यायालय ने कहा था कि अदालत की वास्तविक कार्यप्रणाली का अनुभव न्यायिक अधिकारी के लिए जरूरी है।
अब पुनर्विचार के बाद न्यायालय ने व्यावहारिक अनुभव और प्रशिक्षण के बीच नया संतुलन बनाया है। एक वर्ष की वकालत के साथ चयन के बाद दो वर्ष की प्रशिक्षण-आधारित व्यवस्था लागू होगी।
31 मार्च 2027 तक संक्रमणकालीन राहत
नए नियम लागू होने तक कानून स्नातकों को संक्रमणकालीन राहत दी गई है। इस अवधि में जारी होने वाली संबंधित न्यायिक सेवा परीक्षाओं में अभ्यर्थियों को पूर्व अनुभव की शर्त से राहत मिलेगी। नए ढांचे के तहत एक वर्ष की वकालत की अनिवार्यता 1 अप्रैल 2027 से जारी होने वाली नई भर्तियों पर लागू होने की जानकारी सामने आई है।
सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला न्यायिक सेवा में प्रवेश की राह को अपेक्षाकृत आसान बनाता है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि किताबी ज्ञान के साथ अदालत का व्यावहारिक अनुभव और प्रशिक्षण जरूरी रहेगा।

Post a Comment