प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की क्षमादान और सजा में राहत देने की शक्ति को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल की संवैधानिक शक्ति व्यापक जरूर है, लेकिन इसका इस्तेमाल मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकता। निर्णय लेते समय संबंधित नियमों, सरकारी रिकॉर्ड और मामले के तथ्यों की उचित जांच जरूरी है।
मामला समय से पहले रिहाई से जुड़ा था। अदालत के सामने सवाल था कि क्या राज्यपाल द्वारा किसी कैदी की सजा कम करने या उसे समय से पहले रिहा करने का निर्णय बिना पर्याप्त सामग्री और प्रक्रिया का पालन किए लिया जा सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के निर्णय भी कानून और स्थापित प्रक्रिया के दायरे में होते हैं।
अनुच्छेद 161 राज्यपाल को ऐसे मामलों में क्षमा, सजा को कम करने, स्थगित करने या बदलने की शक्ति देता है, जिन पर राज्य की कार्यपालिका की शक्ति लागू होती है। हालांकि इस शक्ति का इस्तेमाल करते समय संबंधित मामले की परिस्थितियों, अपराध की प्रकृति, कैदी के आचरण और लागू नियमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि दया या समयपूर्व रिहाई से जुड़ा निर्णय केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है। प्रशासन को उपलब्ध रिकॉर्ड और तथ्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन करना होगा। यदि निर्णय के पीछे जरूरी सामग्री या उचित प्रक्रिया का अभाव हो तो न्यायिक समीक्षा का रास्ता खुला रह सकता है।
फैसले का व्यापक संदेश यही है कि संवैधानिक विवेकाधिकार का अर्थ असीमित या निरंकुश अधिकार नहीं है। राज्यपाल की शक्ति संविधान से आती है और उसी संवैधानिक व्यवस्था के भीतर उसका इस्तेमाल भी होना चाहिए। यह फैसला समयपूर्व रिहाई के मामलों में सरकार और प्रशासन की जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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