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कश्मीर में सवाल सिर्फ घुसपैठ का नहीं, दोहरे मापदंड का है

 


आयाम बजाज | संपादकीय


जम्मू-कश्मीर को लेकर देश को भावनाओं से नहीं, तथ्यों और समान नागरिक अधिकारों के चश्मे से देखने की जरूरत है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन किस धर्म का है; सवाल यह है कि भारत की जमीन पर रहने का अधिकार कानून तय करेगा या पहचान और राजनीतिक संरक्षण?



सीमावर्ती क्षेत्रों में आबादी में बदलाव और कथित घुसपैठ की जांच कर रही समिति की रिपोर्ट को लेकर कई दावे सामने आ रहे हैं। रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों की जम्मू-कश्मीर में मौजूदगी के आंकड़ों को लेकर भी अलग-अलग दावे हैं। इन दावों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। लेकिन यदि अवैध रूप से आए विदेशी नागरिकों को संरक्षण मिलता है और दूसरी ओर विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं की सुरक्षित वापसी आज भी कठिन बनी हुई है, तो यह निश्चित रूप से गंभीर राष्ट्रीय प्रश्न है।


1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर विस्थापन भारतीय इतिहास का ऐसा अध्याय है जिसे राजनीतिक सुविधा के लिए भुलाया नहीं जा सकता। आतंकवाद और लक्षित हिंसा ने हजारों परिवारों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर किया। आज भी उनकी वापसी और पुनर्वास केवल घोषणा का विषय नहीं, जमीन पर परिणाम का विषय होना चाहिए।


लेकिन इस बहस को हिंदू बनाम मुसलमान बनाना भी उतना ही खतरनाक है। किसी भारतीय नागरिक को केवल उसकी धार्मिक पहचान के कारण जम्मू-कश्मीर में रहने से रोका जाना स्वीकार्य नहीं हो सकता। उसी तरह किसी विदेशी नागरिक की धार्मिक पहचान देखकर उसे संरक्षण देना भी कानून का विकल्प नहीं हो सकता।


देश के नेताओं से सीधा सवाल है—क्या नागरिकता, सुरक्षा और कानून का पैमाना सबके लिए समान होगा?


विपक्षी दल हों या जम्मू-कश्मीर की सत्ता में बैठे नेता, उन्हें इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देना चाहिए। विदेशी घुसपैठ पर कार्रवाई और विस्थापित नागरिकों की सुरक्षित वापसी किसी दल की विचारधारा नहीं, राज्य की जिम्मेदारी है।


और देशवासियों से भी एक सवाल है—क्या हम कश्मीर को केवल राजनीतिक बहस में याद करेंगे, या वहां के हर नागरिक के समान अधिकार के लिए आवाज उठाएंगे?


आंखें खोलने का अर्थ किसी समुदाय के खिलाफ खड़ा होना नहीं है।

आंखें खोलने का अर्थ है—अन्याय को अन्याय कहना, चाहे पीड़ित कोई भी हो और आरोपी कोई भी।


कश्मीर में न रोहिंग्या के लिए अलग कानून होना चाहिए, न हिंदू के लिए।

एक देश, एक संविधान और एक कानून—यही असली सवाल है।

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