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कालसर्प दोष की पूजा सावन में ही क्यों? त्र्यंबकेश्वर से क्या है खास कनेक्शन

 

राहु-केतु से जुड़ी ज्योतिषीय मान्यता, शिव आराधना और त्र्यंबकेश्वर में होने वाली विशेष पूजा


नई दिल्ली। सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। ज्योतिषीय मान्यताओं में राहु-केतु से जुड़े कालसर्प दोष के लिए भी सावन में शिव पूजा और अभिषेक को महत्वपूर्ण बताया जाता है। हालांकि कालसर्प दोष और इसके प्रभाव ज्योतिषीय मान्यताओं का विषय हैं, इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाता।



मान्यता के अनुसार जब कुंडली में सभी ग्रह राहु और केतु के बीच स्थित होते हैं, तब कालसर्प योग माना जाता है। इसके निवारण के लिए शिव पूजा, महामृत्युंजय मंत्र जाप और नाग संबंधी धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा है।


त्र्यंबकेश्वर से क्यों जुड़ा है नाम?


महाराष्ट्र का त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल है। महाराष्ट्र पर्यटन विभाग के अनुसार यह स्थान विशेष रूप से कालसर्प दोष निवारण पूजा और नारायण नागबली जैसे धार्मिक अनुष्ठानों के लिए प्रसिद्ध है।


सावन में शिव आराधना का धार्मिक महत्व होने के कारण कई श्रद्धालु इस अवधि में त्र्यंबकेश्वर जाकर कालसर्प पूजा कराते हैं। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि कालसर्प दोष की पूजा केवल सावन में ही कराई जा सकती है। अलग-अलग ज्योतिषीय परंपराओं में मुहूर्त और विधि अलग बताई जाती है।


ध्यान रखें: पूजा आस्था और धार्मिक परंपरा का विषय है। किसी भी व्यक्ति को डर दिखाकर महंगे अनुष्ठान कराने के दावों से सावधान रहना चाहिए।

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